शनिवार, 18 जनवरी 2020

विपक्ष ने जो रास्ता चुना है वह आत्मघाती है


                                विपक्ष ने जो रास्ता चुना है वह आत्मघाती है

                                 डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
                अब यह किसी से छिपा नहीं है कि विपक्ष के सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मन केवल और केवल मोदी और अमित शाह हैं. यह भी एक सच्चाई है कि विपक्ष हताश है और इस हताशा में वह ऐसे निर्णय और कदम उठा रहा है जिससे उसका भला कम और नुकसान अधिक हो रहा है. पिछले साल दिसंबर में जब संसद के दोनों सदनों में नागरिक संशोधन बिल पास होकर कानून बना तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश को आगजनी और हिंसा में झोंक दिया जाएगा. असल में इसके पीछे सबसे बड़ा कारण विपक्ष की हताशा ही है.
     सच्चाई तो यह है कि 2014 में देश में जो सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ और जिसने मोदी को देश की बागडोर सौंप दी तब विपक्ष मन मसोसकर रह गया था. उसे लगा था कि यह बड़ा बदलाव 5 सालों के उसके बनवास के लिए है और मोदी जैसा एक क्षेत्रीय नेता देश को चला पाने में अक्षम सिद्ध होगा और वह  स्वत: ही 2019 में अपदस्थ हो जाएगा. लेकिन मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने ना केवल वापसी की बल्कि ऐसा जनादेश प्राप्त किया कि विपक्ष के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. यही नहीं मई 2019 से जनवरी 2020 तक आते-आते मोदी-2 सरकार ने देश हित में जो ताबड़तोड़ फैसले किए उनसे न केवल विपक्ष बल्कि आम जनता की आंखें भी फटी की फटी रह गईं. तीन तलाक, कश्मीर से धारा 370 और 35 का हटना और राम मंदिर का मुद्दा सुलझना आदि ने विपक्ष को हतप्रभ कर दिया. आज विपक्ष के सामने अपने अस्तित्व का संकट खड़ा है. इन तीन महत्वपूर्ण निर्णय के खिलाफ विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ था क्योंकि ये ऐसे निर्णय थे जिनके पीछे जनकल्याण और देशहित की भावना थी. यदि इनका विरोध किया जाता तो यह स्पष्ट होता कि विपक्ष जनहित और देशहित के विरुद्ध कार्य कर रहा है. ऐसी स्थिति में नागरिक संशोधन अधिनियम में छिद्रान्वेष्ण को आंदोलन का आधार बनाना यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस, लेफ्ट और बाकी मोदी विरोधी विपक्षी दलों को मुस्लिम समुदाय के कंधों पर बंदूक चलाने के अलावा सरकार के विरोध का कोई और कारण नजर नहीं आया.
    भारतीय राजनीति में छात्र आंदोलन बहुत से बदलावों का आधार रहे हैं. फलत: विपक्ष ने जेएनयू, एएमयू और जामियामिलिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी  से सीएए एनपीआर और एनआरसी का जो कृत्रिम भय पैदा किया वह पिछले एक माह से आगजनी और हिंसा और धरना प्रदर्शन का कारण बना जिसमें वामपंथी छात्रों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. लेकिन अब ऐसे आंदोलनों का जनमानस पर विपरीत प्रभाव हो रहा है. विश्विद्यालय के ये छात्र जब ‘जिन्ना वाली आजादी’ मांगते हैं तो राष्ट्रवाद और मजबूत हो रहा है. देश के मानस में मोदी के प्रति और मजबूती के भाव पैदा हुए हैं. यह पूरी तरह स्पष्ट है कि सीएए देश के किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन नहीं करता. किंतु मोदी विरोधियों ने इसका हौवा खड़ा कर देश के मुस्लिम समुदाय को ढाल बनाकर सरकार के विरुद्ध ताना-बाना खड़ा कर दिया. लेकिन मोदी सरकार पिछले 1 माह से चल रहे इस आंदोलन के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी है जो स्पष्ट करता है कि सरकार मजबूती के साथ अपने निर्णय पर अडिग है.                            आज की स्थिति में मोदी विरोधी विपक्ष ने ही पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया है. एक तरफ देश का मुस्लिम समुदाय विपक्ष के पीछे खड़ा है तो दूसरी तरफ मोदी समर्थक हिंदू वर्ग है. यह स्थिति मोदी के लिए ज्यादा फायदेमंद ही कही जाएगी. जो काम निर्णायक तौर पर भाजपा, आरएसएस और हिंदूवादी संगठन 70 सालों में नहीं कर सके वह काम मोदी विरोधियों ने पिछले एक माह में करके दिखा दिया. वस्तुतः मोदी विरोधी आज ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां से उन्हें समझ नहीं आ रहा कि कहां जाना है.
    विपक्ष के पास ऐसा नहीं था कि मुद्दे नहीं थे जिन पर मोदी को घेरा जा सकता था. लेकिन उन ज्वलंत मुद्दों को तिलांजलि देकर उसने जो रास्ता चुना वह आत्मघाती ही कहा जाएगा. वस्तुतः यह बात विपक्ष आज तक नहीं समझ सका कि मोदी और अमित शाह वाली भाजपा ने जो निर्णय किए हैं वे दल हित में किए गए निर्णय नहीं हैं, वे ऐसे निर्णय हैं जिनकी देश को साठ सालों से प्रतीक्षा थी. ये निर्णय ऐसे हैं जिनसे विपक्ष को किसी भी तरह का लाभ हो ही नहीं सकता. ये निर्णय विगत 6 महीनों की कालावधि में लिए जाना मोदी की मजबूती को ठोस आधार देने वाले हैं. आगे के साढ़े चार  सालों में मोदी निश्चित ही कुछ और कड़े फैसले जैसे जनसंख्या नियंत्रण, समान नागरिक संहिता और पाक अधिकृत कश्मीर में सैन्य कार्रवाई आदि लेंगे तब विपक्ष के पास जनसमर्थन के लाले पड़ जाना तय हैं.
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शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

क्या दुश्मन देश के ‘आतंकियों’ को नागरिकता चाहता है विपक्ष


      क्या दुश्मन देश के ‘आतंकियों’ को नागरिकता चाहता है विपक्ष
                       डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया  
         बीते साल दिसंबर के आखिरी पखवाड़े में देश भर में जो हिंसा, आगजनी लूटपाट और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का काम हुआ वह आज भी जारी है. देश के सरकार विरोधी रवैये का इसे निकृष्टतम और घृणित काम ही कहा जाएगा. नागरिकता संशोधन अधिनियम(सीएए) के विरोध के नाम पर ऐसा नंगा नाच देख कर देश के इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों पर शर्म आती है. जिस कानून का संबंध केवल मुस्लिम देशों के गैरमुस्लिम प्रताड़ितों को नागरिकता देने से है तथा जिसका संबंध भारत के नागरिकों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालता उसे भ्रम का वातावरण बना कर पूरे देश को हिंसा और अराजकता में घसीटने का अपराध किया जा रहा है. जिस कानून बनाने के पीछे सरकार की मंशा पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, ईसाईयों, पारसियों और जैन धर्मावलंबियों जो भारत की शरण में आए दलितों और शोषितों को संबल देना है  उसे सरकार विरोधियों ने धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ करार देकर विवाद खड़ा किया है. सीएए कानून संसद के दोनों सदनों से गंभीर बहस के बाद अस्तित्व में आया है इससे कोई भी विरोधी दल इंकार नहीं कर सकता लेकिन क्योंकि इस कानून में शरणार्थियों को नागरिकता देने में मुसलमानों का जिक्र नहीं है इसलिए इसे पूरे विपक्ष ने एक मुद्दा बनाकर देश को अराजकता में झोंक दिया.
     सीएए के नाम पर पूरे देश में भ्रम फैलाया गया कि यह कानून मुस्लिम विरोधी है जबकि यह कानून स्पष्ट करता है कि तीन  देशों के प्रताड़ित गैर मुसलमान लोगों को भारत की नागरिकता का प्रावधान इसलिए किया गया क्योंकि यह तीनों देश इस्लामिक है और यहां मुसलमानों के बीच गैर मुस्लिम भारतीयों के साथ अन्याय, शोषण, बलात्कार, हत्या और प्रताड़ना होती है और इन प्रताड़ितों के लिए दुनिया का कोई अन्य देश शरण नहीं देता. तब भारत ही केवल ऐसा देश है जो उनकी सुरक्षा कर सकता है. इतनी स्पष्टता के बावजूद भी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी सरकार विरोधी राजनीतिक दलों, मुस्लिम संगठनों के मौलवियों, भारत तेरे टुकड़े होंगे कहने वाली गेंग  और अराजकता में विश्वास करने वाले असामाजिक तत्वों ने देश को हिंसा की आग में झुलसा दिया.
   प्रचारित यह किया जा रहा है कि यह कानून संविधान के विरुद्ध है जबकि प्रसिद्ध  कानूनविद वकील श्री हरीश साल्वे ने कहा है कि यह कानून भारतीय संविधान की किसी भी धारा का उल्लंघन नहीं करता. अब यह किसी से छिपा नहीं है कि सारे मोदी विरोधी राजनीतिक दल इसे पुरजोर समर्थन कर हवा दे रहे हैं. इन्हें लग रहा है कि मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक पर कानून, कश्मीर से धारा 370 और 35 को हटाने जैसे बड़े निर्णय देश की जनता को कठोर निर्णय करने वाली सरकार के रूप में मोदी को प्रसिद्धि दिला रहे हैं. यही नहीं मोदी के इस कार्यकाल में 70 सालों से लंबित राम मंदिर मामला सुलझना भी मोदी सरकार के पक्ष में जाने के कारण सत्ता विरोधी दल हाशिए पर जाते दिख रहे हैं. यही कारण है कि सीएए के नाम पर मुसलमानों को भड़काने का गुरुतर दायित्व ये सत्ता विरोधी अपने कंधों पर ढोने के लिए सहर्ष तैयार हो गए. विभिन्न प्रदेशों को आग और हिंसा की चपेट में लाकर यदि विरोधी दल यह सोच रहे हैं कि वे मोदी की लोकप्रियता और उनके राजनीतिक कद को छोटा कर देंगे तो वे बड़ी गलतफहमी पाल बैठे हैं. वस्तुतः मोदी विरोधी दल और नेता जिन लोगों के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं उनके पैरों के नीचे की जमीन एकदम खोखली है. विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार धार्मिक ध्रुवीकरण कर रही है. लेकिन अगर गहराई से विचार किया जाए तो धार्मिक ध्रुवीकरण का काम तो हाल के दिनों में विरोधी दलों ने ही किया है. देश को हिंदू मुसलमान में बाँटकर विरोधी दलों ने मोदी सरकार की मदद ही की है. आज की स्थिति में देखा जाए तो सारे विरोधी दल उन मुस्लिमों के लिए लड़ रहे हैं जो धर्म आधारित तीन  देशों के मुस्लिम नागरिक हैं या मुस्लिम घुसपैठिए हैं. बार-बार संविधान की दुहाई देकर यह कहना कि मोदी सरकार ने मुसलमानों को इस कानून में शामिल ना कर देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का अतिक्रमण किया है पूरी तरह से बकवास है क्योंकि इस कानून का स्पष्ट मानना है कि इन तीनों देशों में मुसलमान प्रताड़ित नहीं होते बल्कि अल्पसंख्यक नागरिक ही प्रताड़ित होते हैं तब विदेशी मुसलमानों को नागरिकता दिए जाने का सवाल कहां खड़ा होता है. यही नहीं देश के नागरिकों के मन में यह विश्वास भी दृढ़ता से घर कर रहा है कि विरोधी दल प्रायः पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का परोक्ष रूप से समर्थन करते हैं. पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार ने जितने भी दृढ़ कदम उठाए उन सबके लिए विरोधी दलों ने प्रमाण मांगे. सर्जिकल स्ट्राइक हो या कश्मीर में पत्थरबाजों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई या ऑपरेशन ऑल आउट उन सब का विरोध आडम्बरों के साथ किसी ना किसी रूप में मोदी विरोधी राजनीतिक दलों ने किया जिससे भारत के बहुसंख्यकों, के मन में इन राजनीतिक दलों के प्रति नाराजगी ही ज्यादा दिखी इसीलिए लोग सवाल उठा रहे हैं कि भारत के विरोधी दल कहीं गैर हिंदुओं को नागरिकता देने का समर्थन कर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के कट्टरपंथी आतंकियों को तो देश में नहीं बसाना चाहते. अपने वोट बैंक की खातिर विरोधी राजनीतिक दल  बंगलादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुसलमानों का समर्थन कर देश के एक बड़े वर्ग का बचा खुचा समर्थन भी खोते जा रहे हैं. यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार जिस दृढ़ता से अपने निर्णय लागू कर रही है वह लोगों को पसंद आ रहा है. हालांकि विगत समय में भाजपा को पांच राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं लगाया जा सकता कि मोदी सरकार के राष्ट्र हित में उठाए गए कदमों के विरुद्ध लोगों ने जनादेश दिया है. विरोधी दलों को समझना होगा कि केंद्रीय राजनीति और प्रादेशिक राजनीति दोनों में बड़ा अंतर है. प्रादेशिक स्तर पर क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति और स्थानीय मुद्दे सरकारों के गठन में महत्वपूर्ण होते हैं जबकि राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे पर्याप्त भिन्न होते हैं इसलिए विरोधी दल यदि यह सोचते हैं कि प्रदेशों में जोड़-तोड़ से सत्ता में आने से वे केंद्रीय सत्ता में बड़ा उलटफेर कर सकेंगे दिवास्वप्न ही कहा जाएगा. आश्चर्य तो इस बात का है कि इन प्रदर्शनों और हंगामे के बाद विपक्षी दल चाहते हैं कि सरकार अपना फैसला बदल दे लेकिन वह यह नहीं देख पा रहे कि आज पूरे देश में सीएए के समर्थन में लोग घरों से निकलने लगे हैं और ऐसे में निश्चित ही सरकार इस कदम से पीछे नहीं हटेगी.



सोमवार, 3 जून 2019

अब आधारहीन आरोप और खोखले वादों से चुनाव नहीं जीते जा सकते


  अब आधारहीन आरोप और खोखले वादों से चुनाव नहीं जीते जा सकते
                                        डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
पूरा विपक्ष आज सदमे में है. चिंतन मनन का दौर जारी है, आखिर क्यों विपक्ष की इतनी शर्मनाक हार हुई और क्यों मोदी और भाजपा को इतना प्रचंड बहुमत मिला. सच्चाई तो यह है कि अमित शाह और मोदी की जोड़ी ने विपक्ष के मस्तिष्क को मनोवैज्ञानिक तौर पर कुंद कर दिया. विपक्ष जिस पटरी पर चल रहा था भाजपा के लिए वह लाभदायक था. खासतौर से कांग्रेस जिस प्रचार को अपना तुरुप का इक्का मान रही थी वह पिट गया. आज जनता ना केवल समझदार है बल्कि वह बहकावे और झूठे प्रचार पर चुप रहकर अपनी प्रतिक्रिया वोटों के माध्यम से व्यक्त करती है. उसका विवेक इतना परिपक्व हो गया है कि वह अपने निर्णयों को वास्तविकता के धरातल पर कसने का माद्दा रखती है. जनता में इतना विवेक विकसित हो गया है कि वह यह जानती है कि किसके वायदे केवल वायदे रहेंगे और कौन अपने वादों पर खरा उतरेगा. कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी इन चुनावों में यह रही कि वह जनता में मोदी के कामों से खुशी की बहती धारा को समझ ही नहीं पाई. वह उन पुराने घिसे पिटे मुद्दों को प्रचारित करती रही जो मुद्दे थे ही नहीं. कांग्रेस के पास ऐसे चुनाव इतिहास थे जिन पर उसकी सरकारों का पतन हुआ या ऐसे मुद्दे थे जिन पर उसे हानि उठानी पड़ी थी. वह समझ रही थी कि जिस प्रकार 2014 में मोदी ने यूपीए-2 के घोटालों, महंगाई, गरीबी, काला धन जैसे मुद्दों पर प्रहार कर कांग्रेस को मात दी थी उसी प्रकार 2019 में वह राफेल में घोटाले को मुद्दा बनाकर चुनाव जीत लेगी. जिस प्रकार भाजपा ने वादे किए थे वैसे ही लोकलुभावन वायदे (72000) करके वह मोदी को पटखनी दे देंगे. लेकिन यह नहीं हो सका. कारण साफ है कि 2014 में कांग्रेस की 10 सालों की सरकार में जनकल्याण के ऐसे कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुए थे जैसे एनडीए के 5 साल के शासनकाल में हुए. जनता बातों में विश्वास नहीं करती बल्कि ठोस कामों में विश्वास करती है. कांग्रेस को लगता था कि प्रधानमंत्री मोदी और एनडीए सरकार को राफेल में भ्रष्टाचार पर घेर कर वह जनता के वोट हासिल कर लेगी या पूरा विपक्ष अनर्गल आरोप लगाकर मोदी की जीत को सीमित कर देगा तो यह स्पष्ट हो गया कि उनकी यह गलत धारणा थी. कांग्रेस 3 राज्यों में सरकार बनाकर इतनी उत्साहित थी कि उसे लगता था कि वह लोकसभा में मोदी को हराकर सरकार बना सकती है. उसका ऐसा सोच कि मोदी को हर मोर्चे पर असफल और राफेल में भ्रष्टाचार पर प्रचार कर लोकसभा जीत जाएगी गलत साबित हुआ. कारण स्पष्ट है कि इस चुनाव में यह मुद्दा था ही नहीं. विपक्ष ने दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ा ही नहीं जिसमें पूरे देश में मोदी के दलितों, पिछड़ों, गरीब और कमजोर वर्गों, अल्पसंख्यकों को बिना भेदभाव के कुछ ना कुछ जनकल्याण के कामों का लाभ मिला था. कांग्रेस का यह भरोसा कि 3 राज्यों में जीत हासिल कर सरकार बना लेने की वजह से जनमत मोदी के विरोध में हो गया है पूरी तरह से गलत एसेसमेंट था. जनता बहुत चुप होकर उन सब स्थितियों का जायजा ले रही थी कि कौन उसकी समस्याओं को ज्यादा त्वरित गति और गंभीरता से हल करेगा. जिन तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने 2018 में जीत हासिल की उन राज्यों में कांग्रेस का सफाया इस बात की ओर संकेत करता है कि इन राज्यों की जनता भाजपा के शासन और उसकी डिलीवरी से नाराज नहीं थी. बल्कि वह इस बात से नाराज थी कि अगड़ी जातियों के एट्रोसिटी एक्ट के माध्यम से अधिकार सीमित किए जा रहे हैं. एससी एसटी एक्ट के माध्यम से उन्हें तंग किया जा सकता है. तब कांग्रेस के प्रचार ने किसानों पर होने वाले तथाकथित जुल्मों को मुद्दा बनाकर ग्रामीण क्षेत्र में भाजपा के विरुद्ध माहौल बनाने में कामयाबी पाई थी. कांग्रेस ने कर्ज माफी के वादे कर जनता को अपने पाले में लाने में सफलता पाई थी. कांग्रेस सरकारें बनने का एक बड़ा कारण यह भी था कि वे मतदाता जो भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाता रहे आए हैं उन्होंने भाजपा को सबक सिखाने के लिए तब नोटा में वोट किया था जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त बना ली थी. इन चुनावों में कांग्रेस यह नहीं समझ पाई कि 3 राज्यों में उसकी जीत उसकी नीतियों और वायदों की जीत नहीं थी बल्कि लोगों की भाजपा से अस्थाई नाराजी थी. जो वोटर भाजपा से छिटक गए थे वह लोकसभा में पुनः उसके साथ आ गए.
 दूसरी ओर भाजपा ने इन लोकसभा चुनावों को मोदी विरुद्ध समूचे विपक्ष की ओर केंद्रित कर दिया उसका कारण भी विपक्ष का मोदी हटाओ का नारा था. लोगों को लगा कि विपक्ष और खासतौर से कांग्रेस के पास जनता को देने के लिए कुछ नहीं है वह केवल मोदी को हटाकर सत्ता प्राप्त करना चाहती है. वहीं चुनाव के आगाज के थोड़े पहले अब होगा न्याय के जुमले पर भी आम जनता विश्वास नहीं कर सकी. कहते हैं भूतकाल की काली छाया वर्तमान और भविष्य पर कभी खत्म नहीं होती. 10 सालों के कांग्रेस के लचर शासन की काली छाया कांग्रेस पर इतनी गहरी थी कि उसने जनता में कांग्रेस के प्रति अविश्वास बनाए रखा. फलत: अब होगा न्याय भी कारगर नहीं हो सका.
 चुनाव नतीजे इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि मोदी 2014 के चुनावों से अधिक शक्तिशाली बन कर दोबारा सत्ता में आए हैं. जहां एक और प्रत्याशियों की जीत हार का अंतर लाखों में रहा वहीं पिछले चुनाव की तुलना में भाजपा ने 282 के मुकाबले इस बार 303  सीटें जीती. भाजपा को यह जनादेश मोदी में जनता के विश्वास को प्रकट करता है. जनता ने दिल खोलकर मोदी के 5 सालों के कामकाज पर न केवल मोहर लगाई बल्कि अगले 5 साल के लिए प्रचंड जनादेश देकर अपने भविष्य के सुरक्षित होने की प्रत्याशा प्रकट की.
 इस चुनाव का एक बड़ा मुद्दा राष्ट्रवाद भी रहा. वस्तुतः इन चुनावों से यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो गई कि आम नागरिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर एकमत है जो दल देश की अस्मिता के लिए कठोर निर्णय करने में सक्षम है वह दल जनता की आंखों का तारा है.
 उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां बसपा और सपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व था इनका गठजोड़ भी काम नहीं आया. फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में जीत ने इनमें नई ऊर्जा का संचार किया था लेकिन यह इन चुनावों में धराशाई हो गया. राजनीतिक पंडितों का यह गणित कि इनके गठजोड़ से भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा गलत साबित हुआ. दोनों दलों को 80 में से मात्र 15 सीटों पर जीत हासिल हुई जो यह स्पष्ट करता है कि उत्तर प्रदेश की जनता ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोकतंत्र को मजबूत किया. भाजपा और एनडीए को 62 सीटें मिल ना हैरान करने वाला जरूर है किंतु यह प्रकट करता है कि लोगों का मोदी में गहरा विश्वास है, मोदी को गरीबों, किसानों और अल्पसंख्यकों का भरपूर समर्थन मिला. बिहार और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल इलाकों में 20 से अधिक सीटों पर एनडीए की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब मुस्लिम मतदाता विपक्ष की तुष्टीकरण की राजनीति को समझ गया है. अब वह अपने कल्याण के बारे में सोचने लगा है.
सबसे बड़ी बात उत्तर प्रदेश की यदि कोई है तो वह राहुल गांधी की पराजय है. इस पराजय से यह स्पष्ट हो गया कि यदि कोई प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में कल्याण कार्यों की अनदेखी करता है तो उसकी परंपरागत सीट भी आगे आने वाले समय में सुरक्षित नहीं रहेगी. सच्चाई तो यह है कि कांग्रेस का प्रदर्शन एक विश्वसनीय पार्टी के अनुरूप नहीं रहा. पिछली लोकसभा के मुकाबले उसे इस बार 8 सीटें ज्यादा भले ही मिली हों लेकिन यह सीटें उसे गैर हिंदी राज्यों केरल, तमिलनाडु और पंजाब में ही मिली. यह सफलता भी राहुल गांधी की लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि दूसरों की लोकप्रियता के कारण प्राप्त हुई. केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जनता का मोहभंग, तमिलनाडु में डीएमके से गठजोड़ और पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की लोकप्रियता के कारण तीनों राज्यों में कांग्रेस को 31 सीटें मिलीं  जो इस बात को प्रकट करता है कि  कांग्रेस अब बहुत पिछड़ चुकी है. जबकि भाजपा और एनडीए को जो सफलता मिली वह उसकी आम आदमी की आकांक्षाओं की पूर्ति के कारण मिली. अब कांग्रेस को 2024 को दृष्टि में रखकर रणनीति तैयार करना पड़ेगी. उसे आम जनता की परेशानियों को समझना होगा. उसे सरकार के उचित कामों की सराहना करनी होगी और सरकार के कामों से अलग हटकर वह जनता की भलाई के लिए और क्या कुछ कर सकती है उसका रोड मैप तैयार करना होगा. अनावश्यक विरोध पर अंकुश लगाना होगा तभी वह   कुछ सम्मान पा सकती है. इन चुनाव परिणामों से कांग्रेस ही नहीं पूरे विपक्ष को यह समझ आ गया होगा कि आधारहीन आरोप और खोखले वादों से अब नहीं चुनाव नहीं जीते जा सकते.


सोमवार, 20 मई 2019

चौकीदार चोर और मोदी हटाओ ही विपक्ष पर भारी पड़ा दिख रहा है


     चौकीदार चोर और मोदी हटाओ ही विपक्ष पर भारी पड़ा दिख रहा है

                      डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया  
     आखिरकार वह दिन आने वाला है जब विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में कौन सरकार बनाएगा निश्चित होगा. क्या मोदी फिर एक बार सरकार बनाएंगे या विपक्ष मोदी पर भारी पड़ेगा. सारे एग्जिट पोल से तो यही प्रतीत होता है कि ‘फिर एक बार मोदी सरकार’ को इतना जन समर्थन प्राप्त हुआ है कि एनडीए आसानी से सरकार बना सकेगी किंतु इन अनुमानों को परिणाम मानना उचित नहीं है. जब तक परिणाम नहीं आते देश के सारे राजनीतिक दल अपने अपने अनुमानों बताते रहेंगे. यह इसलिए भी कि 2017 में जब लगभग सभी एग्जिट पोल उत्तर प्रदेश में गैर भाजपा की सरकार बनवा रहे थे तब भाजपा ने 300 से अधिक सीटें जीतकर अखिलेश, मायावती और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था. स्वाभाविक है इन एग्जिट पोल के परिणामों पर विपक्ष की सोच ऐसी ही होगी कि यह पोल जैसे रुझान बता रहे हैं वह शायद परिणामों में ना दिखें.
 अब बात करते हैं कि वर्तमान एग्जिट पोल के रुझानों के अनुरूप यदि परिणाम आते हैं तो उसके पीछे के कारण क्या हैं. क्या वाकई मोदी का जादू बरकरार है. क्या मोदी के विकास कार्यों को जनता ने पसंद किया. क्या मोदी के नोटबंदी और जीएसटी जैसे कठोर निर्णयों को जनता ने तमाम आलोचनाओं के बाद भी पसंद किया. क्या जनता ने मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा में उठाए गए कड़े कदमों को पसंद किया. स्वाभाविक है मोदी विरोधी इन प्रश्नों के हमेशा विपरीत मत के रहे हैं. वे मोदी के प्रत्येक काम की आलोचना करते रहे हैं. तो क्या इन आलोचनाओं को जनता ने नकार दिया. अगर वाकई मोदी दोबारा सत्ता में आते हैं तो एक बात साफ है कि विपक्ष ने मोदी को गालियां ज्यादा दीं जिसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ सकता है. जब सारे देश में मोदी एक विकास के सिंबल माने गए तब ‘चौकीदार चोर है’ का नारा विपक्ष को बूमरैंग होता दिखाई देता है. अगर सामान्य जन से बात की जाए तो वह इस मत का दिखेगा कि मोदी और कुछ भी हो सकते हैं किंतु चोर नहीं हो सकते. उनकी ईमानदारी पर उंगली नहीं उठाई जा सकती. हमारे देश की परंपराएं और मान्यताएं इस बात को स्थापित करती हैं कि जो व्यक्ति पारिवारिक माया मोह से परे है वह व्यक्ति सेवा के क्षेत्र में अनुपम होता है. जिस व्यक्ति का चिंतन समूचे देश को अपना परिवार मानने का हो वह व्यक्ति कभी बेईमान नहीं हो सकता. वह व्यक्ति चोरी क्यों और किसके लिए करेगा. यह तो पूरी तरह से स्पष्ट है कि मोदी की ना तो करोड़ों की संपत्ति है और ना ही ऐसी कोई परिजन आसक्ति ही है कि वह देश के साथ बेईमानी करें. तब विपक्ष का ‘चौकीदार चोर है’ का नारा जनता में मोदी के प्रति नकारात्मक प्रचार से भरा हुआ माना गया होगा. अगर राफेल को लेकर इतना बड़ा आरोप लगाया ही गया था तो विपक्ष की यह जिम्मेदारी बनती थी कि वह जनता के सामने ठोस प्रमाण रखती. सिर्फ हवाबाजी को जनता किस आधार पर तवज्जो देती. फिर राफेल मामले में संसद में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त मंत्री अरुण जेटली जैसे दिग्गजों ने सिलसिलेवार तरीके से विपक्ष के आरोपों पर कटाक्ष किए तब भी विपक्ष कोई ठोस प्रमाण देने में असमर्थ रहा तो फिर जनता में यही संदेश गया कि विपक्ष मुद्दा विहीन होकर मोदी की इमानदारी पर प्रश्नचिन्ह लगा कर चुनाव जीतना चाहता है जिसे एग्जिट पोल के नतीजों में देखा जा सकता है.
 दूसरी ओर विपक्ष का मोदी हटाओ एजेंडा भी उसी पर भारी पड़ गया. वस्तुतः आज के संदर्भों में दलों के सोचने का जनता पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि जनता क्या सोचती है का प्रभाव दलों पर पड़ता है. वस्तुतः जितने ज्यादा जोर से मोदी हटाओ को प्रचारित किया गया वह मोदी के लिए लाभदायक ही सिद्ध हुआ. जनता में यह संदेश गया कि विपक्ष सत्ता की लालची है, उसके पास जनकल्याण के मुद्दे नहीं है बल्कि विपक्ष का एकमात्र एजेंडा यही है कि वह किसी भी हालत में मोदी को आने नहीं देना चाहता. मोदी की एक विशेषता 2014 से देखने को मिलती रही कि वह विपक्ष के हमलों को बखूबी तरीके से अपने पक्ष में बदलने में सिद्धहस्त हैं. यही कारण है कि उन्होंने ‘चौकीदार चोर है’ को ‘मैं भी चौकीदार’ में कन्वर्ट कर दिया और उसका परिणाम यह हुआ कि ‘चौकीदार चोर है’ के नारे की हवा निकल गई.
 अब यदि उन मुद्दों पर विचार करें जिन्हें मैंने प्रारंभ में उठाए हैं तो निष्कर्ष रूप में एग्जिट पोल के नतीजों से लगता है कि मोदी का जादू वाकई बरकरार है. यदि ऐसा नहीं होता तो 300  पार का अनुमान संभव नहीं था. दूसरी बात विपक्ष कितनी भी आलोचना करे लेकिन मोदी ने विकास कार्यों और गरीब तबकों को ज्यादा महत्व दिया है. इसी क्रम में सामान्य जातियों को 10% आरक्षण, स्वच्छता मिशन, जनधन अकाउंट, प्रधानमंत्री आवास, उज्जवला योजना, आयुष्मान भारत, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएं विकास की इबारत लिखने में सफल रहीं. तो वहीं दूसरी ओर 18000 गांव को बिजली और सड़क जैसे कल्याणकारी कामों ने जनता में एक सकारात्मक भाव उत्पन्न किया. इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में 5 साल की अल्प अवधि में जो परिवर्तन हुए वे निसंदेह उल्लेखनीय हैं. इन सब के आधार पर एग्जिट पोल में एनडीए की बढ़त स्वाभाविक लगती है. यहां इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि विरोधी इन विकास कार्यों को झूठा साबित करने में नाकामयाब रहे. भले ही विपक्ष चिल्ला चिल्ला कर यह कहता रहा कि देश में विकास कार्य ठप्प रहे लेकिन अगर यही परिणाम रहते हैं तो कहा जा सकता है की जनता ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया. दूसरी तरफ नोटबंदी और जीएसटी जैसे निर्णायक फैसलों पर जनता भले ही नाराज (जैसा कि विपक्ष मूल्यांकन करता है) दिखाई दी परंतु मोदी पर उसका विश्वास बरकरार रहा प्रतीत होता है. एक बहुत बड़ा मुद्दा देश की सुरक्षा और राष्ट्रवाद का रहा. अगर ये रुझान परिणामों में तब्दील होते हैं तो कहा जा सकता है कि इन दोनों मुद्दों पर भाजपा विपक्ष पर हावी रही. सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक दोनों ही मोदी के पक्ष में रहे दिखते हैं तो वहीं इन कार्र्बाइयों पर विपक्ष का सबूत मांगना उसी के लिए गले की हड्डी बन गया. कुल मिलाकर जनता ने देश की सुरक्षा और राष्ट्रवाद पर मोदी को शत प्रतिशत सही माना. दूसरे शब्दों में देश ने माना कि राष्ट्र मोदी के हाथों में सुरक्षित है. वहीँ देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने विकास का ना तो कोई विजन प्रस्तुत किया और ना उसका कोई रोडमैप जनता के समक्ष आ पाया. और ‘अब होगा न्याय’ भी जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहा प्रतीत होता है. गरीबों को 72000 सालाना की बात पर गरीब वर्ग विश्वास नहीं कर सका उसका कारण मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कर्ज माफी के क्रियान्वयन में शत-प्रतिशत परिणामों का अभाव रहा. कांग्रेस की 72000 वाली योजना संदेह के घेरे में रही जिसका लाभ मोदी को मिला. जहां एक ओर मोदी ने जितने जनकल्याण के वादे किए उनमें शत प्रतिशत सफलता भले ही ना मिली हो किंतु क्रियान्वयन हुआ जो जनता को सुखद अनुभूति कराने में सफल रहा. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इस बात का भी असर हुआ कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी को सपा बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों ने भी नकार दिया और उससे गठबंधन नहीं किया. स्वाभाविक है कि कांग्रेस की प्रतिष्ठा को धक्का लगा जिसने उसके परिणामों को प्रभावित किया. दूसरी तरफ माहौल कुछ इस तरह का बना कि मोदी विरोधी दल मुस्लिम वोटों को अपने पाले में मानकर शत-प्रतिशत जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं इस संदेश ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण में मदद की. यदि परिणाम भी एग्जिट पोल के रुझानों के अनुरूप आते हैं तो यह कहा जा सकता है कि फिलहाल जनता मोदी विरोधियों में मोदी के कद का कोई नेता नहीं देख पा रही है. और अंत में एग्जिट पोल परिणाम नहीं अनुमान होते हैं वे कितने सही या गलत हैं 23 मई को ही मालूम पड़ेगा. इतना जरूर है कि जहां एक और एनडीए और भाजपा में खुशी है तो वहीं विरोधियों में मायूसी है भले ही वे इसे प्रकट नहीं करें.
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