शनिवार, 12 दिसंबर 2020

नए भारत की लोकतांत्रिक आवश्यकताओं को पूरा करेगा नया संसद भवन

 

        नए भारत की लोकतांत्रिक आवश्यकताओं को पूरा करेगा नया संसद भवन

                            डॉ हरिकृष्ण बड़ोदिया

        इसमें कोई संदेह नहीं कि आज का संसद भवन स्थापत्य का नायाब नमूना है और यह भी सच है कि लगभग 100 साल पहले बने इस संसद भवन ने देश के लोकतांत्रिक कर्तव्यों के निर्वाह करने में जनप्रतिनिधियों की अब तक बहुत सेवा की है, किंतु समय के साथ हर चीज कमजोर होती चली जाती है पूरी एक शताब्दी के बाद आज यह मानना कि वर्तमान संसद भवन अभी 50 साल और अपनी सेवाएं दे सकता था बड़ी भूल होगी और एक नायाब भवन के साथ अन्याय होगा निसंदेह आज जरूरत इसी बात की थी कि इस भवन को एक यादगार के रूप में संरक्षित किया जाए जो पीढ़ी दर पीढ़ी आम लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास को बताता रहे, जो बताए कि 100 साल पहले बने इस भवन ने लोकतंत्र के कई पड़ाव देखे हैं

      गुरुवार को जब नए संसद भवन का शिलान्यास हुआ तब एक बात स्पष्ट हो गई कि वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी एक दूरदृष्टि और पक्के इरादे वाले व्यक्ति हैं नए संसद भवन के निर्माण की रूपरेखा वस्तुतः उन सरकारों को बनानी चाहिए थी जिन्होंने इस देश पर 60 से अधिक वर्षों तक राज किया किंतु केवल सत्ता पर विराजमान रहने के अलावा इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं गया प्रधानमंत्री मोदी ने भवन की आधारशिला रखते हुए ठीक ही कहा कि ‘नया संसद भवन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा इसका केवल प्रतीकात्मक महत्व नहीं है बल्कि यह बदलते भारत और नए भारत की लोकतांत्रिक आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा’

     वर्तमान संसद भवन की आधारशिला 12 फरवरी 1921 को रखी गई थी जिसे बनने में 6 साल लगे थे तथा इस पर कुल 83 लाख रुपए की लागत आई थी इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने किया था स्वाभाविक है वर्तमान संसद भवन लंबे समय तक सेवाएं देने में सक्षम नहीं रहेगा जब इस भवन का उद्घाटन हुआ था तब इसमें  तीन महत्वपूर्ण सभाकक्ष थे जिन्हें चेंबर ऑफ प्रिंसेस, स्टेट काउंसिल और सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली कहा गया था स्वतंत्र भारत में आजादी के बाद इन तीनों को क्रमश: लाइब्रेरी हाल, राज्यसभा और लोकसभा के रूप में तब्दील कर दिया गया था स्वतंत्रता के बाद जैसे-जैसे भवन में प्रतिनिधियों की आवश्यकताओं में इजाफा होता गया वैसे वैसे इसमें अतिरिक्त निर्माण किए जाते रहे

      नए संसद भवन का निर्माण स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने के पहले सन 2022 तक पूरा हो जाएगा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का यह कहना कि 2022 में संसद सत्र नए संसद भवन में ही आयोजित होगा इस बात का प्रतीक है कि निर्माण कार्य द्रुतगति से किया जाएगा

 इस निर्माण कार्य में लगभग 2000 लोग प्रत्यक्ष रूप से तथा 9000 लोग अप्रत्यक्ष रूप से काम करेंगे उनका यह कहना कि नया संसद भवन देश की सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन करेगा सुखद अनुभूति देता है नया संसद भवन 64500 वर्ग मीटर क्षेत्र में बनेगा यह इमारत भूकंप रोधी होगी इसके निर्माण पर लगभग 862 करोड रुपए खर्च किए जाएंगे इस भवन के सेंट्रल हॉल में देश के 1224 माननीय सांसद एक साथ बैठ सकेंगे इस भवन में 876 सीट वाली लोकसभा और 400 सीट वाली राज्य सभा होगी लोकसभा अध्यक्ष श्री बिरला के अनुसार इस भवन में बेसमेंट भूतल, प्रथम तल और द्वितीय तल होंगे इसकी ऊंचाई भी वर्तमान संसद भवन के बराबर होगी ताकि दोनों भवनों में समरूपता दिखाई दे लोकसभा अध्यक्ष का कहना है कि नए संसद भवन में सभी सांसदों के अलग कार्यालय होंगे जो आधुनिक डिजिटल सुविधाओं से लैस होंगे यही नहीं इसे पेपरलेस ऑफिस बनाया जाना है इसमें सांसदों के लिए एक लोंज और पुस्तकालय, विभिन्न समितियों के कक्ष, भोजन कक्ष और पार्किंग क्षेत्र होंगे यह नया संसद भवन नए भारत की प्रगति का सूचक बनेगा देश के आम नागरिक को इस पर गर्व होगा तो वहीँ यह विश्व पटल पर भारत की भवन निर्माण कला का उत्कृष्ट उदाहरण बनेगा

      किंतु भारत में जब तक किसी भी काम का विरोध ना हो तब तक आपत्ति करने वालों को रोटी हजम नहीं होती है यह सही है कि 10 दिसंबर को नए संसद भवन का प्रधानमंत्री मोदी ने शिलान्यास किया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में लगभग 10 याचिकाएं इसके निर्माण पर आपत्ति की दायर हुई हैं जिन पर निर्णय होना है सुप्रीम कोर्ट ने अभी केवल आधारशिला रखने की इजाजत दी है इसमें सबसे अहम याचिका वकील राजीव सूरी की है, उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट के निर्माण और जमीन के इस्तेमाल पर आपत्ति दर्ज की है याचिकाकर्ताओं की आपत्ति है कि संसद भवन वाले इलाके में नई इमारत बनाने पर रोक लगी हुई है अब इन्हें कौन समझाए कि यह रोक किसी अन्य तरह के निर्माण कार्य जो संसद भवन से जुड़े नहीं हैं पर है ना कि नए संसद भवन के निर्माण पर

      वस्तुतः नरेंद्र मोदी के एक के बाद एक उल्लेखनीय कामों से विपक्ष की हर पार्टी हैरान परेशान नजर आ रही है। देश की सांस्कृतिक पहचान को स्थायित्व देने के लिए जहां एक ओर अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद राम मंदिर निर्माण का काम प्रारंभ हो गया है वहीं गुरुवार को मोदी ने देश के नए संसद भवन के निर्माण की आधारशिला रखकर ब्रिटिश काल में बने वर्तमान संसद भवन को वक्त के झंझावातों  से बचाने और उसे संरक्षित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, लेकिन देश के विपक्ष को ये सब रचनात्मक निर्णय पसंद नहीं आ रहे हैं। राम मंदिर निर्माण निर्णय पर विपक्ष ने उतनी मुखर आलोचना इसलिए नहीं की थी क्योंकि उसे हिंदुओं की बेरुखी का डर था किंतु नए संसद भवन के निर्माण पर कांग्रेस की छाती पर सांप लोट गया है। यही कारण है कि उसके महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट कर मोदी को संबोधित करते हुए लिखा 'मोदी जी इतिहास में यह भी दर्ज होगा कि जब अन्नदाता सड़कों पर दो हफ्ते से अधिक समय से हक की लड़ाई लड़ रहे थे तब आप सेंट्रल विस्टा के नाम पर 'अपने लिए' महल खड़ा कर रहे हैं। इस ट्वीट से यह तो स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस कितनी हताश है। वह समझ रही है कि संसद भवन का निर्माण देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी जिसका लाभ मोदी को अगले चुनाव में मिलने से नहीं रोका जा सकता। इसी ट्वीट में सुरजेवाला का यह कहना कि 'आप सेंट्रल विस्टा के नाम पर अपने लिए महल खड़ा कर रहे हैं' स्पष्ट करता है कि कांग्रेस को किसी तरह की गलतफहमी नहीं है कि 2024 में पुनः मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। यदि ऐसा नहीं होता तो वे यह नहीं लिखते कि 'आप अपने लिए महल खड़ा कर रहे हैं'। वस्तुतः विपक्ष का मोदी के हर काम की आलोचना करना स्वयं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। जो पार्टी 70 साल के शासन में वर्तमान संसद भवन के भविष्य और नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नए संसद भवन के निर्माण पर कोई विजन नहीं दे पाई उससे आलोचना के सिवाय और क्या उम्मीद की जा सकती है। जो प्रतिनिधि अपने महल बनाने में ही लगे रहे हों वे संसद के महल को बनाने के बारे में कैसे सोच सकते थे। कांग्रेस के ही जयवीर शेरगिल ने कहा कि ‘यह अंतिम संस्कार के समय डीजे बजाने जैसा है’। अब यह तो शेरगिल जी ही बता सकते हैं किसका अंतिम संस्कार है, वैसे ऐसा नकारात्मक सोच नहीं रखना चाहिए।असल में पूर्व की सरकारों के जिम्मेदार मंत्री और प्रतिनिधियों ने स्वयं की उन्नति के बारे में सोचने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया होता तो देश की उन्नति के बारे में सोच पाते। आज जब पीएम मोदी देश की उन्नति के बारे में निर्णय ले रहे हैं तो यह सब अखरना स्वाभाविक है।

                                           

 

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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

  रद्दी हुए झंडे को भूल तिरंगे का सम्मान करना सीख लो मोहतरमा

 

                रद्दी हुए झंडे को भूल तिरंगे का सम्मान करना सीख लो मोहतरमा

                                                  


डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया 

      भाजपा ने 2015 में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी से साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई थी, तब ना केवल राजनीतिक पंडितों को आश्चर्य हुआ था बल्कि देश की विपक्षी पार्टियों ने भी भाजपा की आलोचना की थी। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि सत्ता के लिए भाजपा अपने मौलिक लक्ष्यों से भटक चुकी है। जब फरवरी 2015 में जम्मू कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी तब मुफ्ती साहब ने अपने पहले बयान में कहा कि ‘वे राज्य में विधानसभा चुनाव की सफलता के लिए पाकिस्तान, हुर्रियत और आतंकवादियों के शुक्रगुजार हैं जिनकी वजह से चुनाव सफलतापूर्वक हो पाए', उन्होंने कहा 'अगर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते या फिर पाकिस्तान सीमा पार से गोलीबारी करता तो चुनाव के लिए बेहतर माहौल राज्य में नहीं बन पाता।' यह ऐसे बयान थे जिनसे मुफ्ती मोहम्मद सईद की पाकिस्तान परस्ती और आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी स्पष्ट होती है। सबसे बड़ा अचरज तो इसी बात का था कि भाजपा जैसी दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी और आतंकवाद की कट्टर विरोधी, हुर्रियत  और पाकिस्तान के विरुद्ध कठोर रुख रखने वाली पार्टी ने कैसे मुफ्ती के साथ सरकार बनाना स्वीकार किया। निश्चित ही इसके पीछे जहां एक ओर जम्मू कश्मीर में जम्मू के प्रतिनिधित्व को महत्व दिलाना था वहीं  एक ऐसा प्रयोग था जो सफल होता तो ठीक नहीं होता तो भाजपा पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना था। भाजपा नहीं चाहती थी कि नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी मिलकर सरकार में कट्टरवादी आतंकवाद के दो समर्थक एक साथ जम्मू-कश्मीर की जनता को हानि पहुंचाते। वहीं आज लगता है कि भाजपा सरकार में रहकर भविष्य में लागू की जाने वाली उसकी नीतियों के संदर्भ में अनुसंधान कर रही थी जो हमें बाद में समझ आता है।         कौन नहीं जानता कि जम्मू-कश्मीर के दो सियासी परिवार अब्दुल्ला और मुफ्ती के बिना कश्मीर में सियासत की कल्पना नहीं की जा सकती थी और यही सच भी था। यह दोनों दल और इनके नेता सत्ता में रहते हुए एक दूसरे के बहुत बड़े आलोचक हैं। किंतु हुर्रियत, आतंकवाद और पाकिस्तान के अपने स्तर पर कट्टर समर्थक हैं। लेकिन जब एक दल सत्ता में होता है तो दूसरा दल सत्ताधारी दल की आलोचना से कभी पीछे नहीं हटता। यही कारण था कि जब मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पाकिस्तान और हुर्रियत  और आतंकवादियों की वजह से जम्मू कश्मीर में चुनावों की सफलता में कसीदे पढ़े तो उमर अब्दुल्ला ने आलोचना करते हुए कहा कि ‘कश्मीर की कौम के लिए पाकिस्तान और आतंकी कभी अच्छे नहीं हो सकते और जो लोग ऐसा सोचते हैं उनकी सोच भी सोच का विषय है।’ बयान की दृष्टि से लगेगा कि नेशनल कांफ्रेंस पाकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ दिखाई दे रही है लेकिन यह दोनों दल सुविधा की राजनीति करने वाले जम्मू कश्मीर के शातिर खिलाड़ी हैं।

    वस्तुतः भाजपा ने फरवरी 2015 से जम्मू कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में सरकार चलाई। दुर्भाग्यवश 7 जनवरी 2016 को मुफ्ती मोहम्मद सईद का निधन हो गया और जम्मू कश्मीर में दोबारा सरकार बनाने की जरूरत आ पड़ी। तब  भी समीकरण वही थे। सूत्र पीडीपी और बीजेपी के पास ही थे। बहुत लंबे विचार विमर्श के बाद 4 अप्रैल 2016 को महबूबा मुफ्ती ने 13वे  मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इस सरकार के गठन में भाजपा के जम्मू कश्मीर प्रभारी राम माधव की बड़ी भूमिका थी। इस गठबंधन से सबसे ज्यादा परेशान कांग्रेस थी जिसने इसे ‘अपवित्र गठबंधन’ निरूपित किया था। वस्तुतः राज्य की जो स्थिति मुफ्ती मोहम्मद सईद के समय थी वही स्थिति मेहबूबा के समय रही। वही पाकिस्तान का समर्थन, आईएसआईएस के झंडे, पाकिस्तान के झंडे, सेना पर पत्थरबाजी और आतंकवादियों का समर्थन ऐसी स्थितियां थीं जिनसे भाजपा का नेतृत्व पीड़ा तो महसूस करता था लेकिन गठबंधन धर्म के कारण बोल नहीं पाता था। महबूबा के हठधर्मी नेतृत्व ने भाजपा के नेताओं को असहज कर दिया था लेकिन भाजपा किसी बड़े उद्देश्य के तहत उन की नाफरमानियों को बर्दाश्त कर रही थी। महबूबा भी अब्दुल्ला परिवार की तरह पाकिस्तान से प्रेम और भारत से नफरत करने वाली राजनेता हैं। इनका छद्म भारत प्रेम सही मायनों में दिखावा है क्योंकि समय-समय पर दिए गए इनके बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि दोनों परिवार खुदगर्ज और अब्बल दर्जे के देशद्रोही हैं। कश्मीर में वर्तमान सरकार की पाकिस्तान के संदर्भ में जीरो टॉलरेंस नीति से यह खासे परेशान रहते रहे। ये हमेशा पाकिस्तान से वार्ता की वकालत करते रहे। जब केंद्र की मोदी सरकार ने अचानक महबूबा मुफ्ती की सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो यह सकते में आ गईं। तब इनके दोगले चेहरे उजागर होने शुरू हो गए। अप्रैल 2019 में उन्होंने भारत को धमकी देना शुरू कर दिया। एक बयान में महबूबा ने कहा ‘भारत ने परमाणु बम दिवाली के लिए नहीं रखा है उसी तरह पाकिस्तान ने भी इसे ईद के लिए नहीं रखा है।‘

     स्पष्ट है कि जिस तरह की बकवास और परमाणु बम की धमकी पाकिस्तान के हलकट मंत्री भारत को देते रहते हैं उसी तरह महबूबा मुफ्ती ने भी बयान दिया। पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की तरफदारी करते हुए महबूबा ने कहा ‘इमरान खान नए हैं और उन्हें एक मौका देना चाहिए।‘ स्पष्ट करता है कि इतनी बड़ी आतंकी घटना को भी नजरअंदाज करते हुए भी वे पाकिस्तान से प्रेम दिखा रही थीं। जब भाजपा ने मेहबूबा से समर्थन वापस लिया और जम्मू कश्मीर में राज्यपाल नियुक्त हुए तब अब्दुल्ला परिवार और महबूबा मुफ्ती को लगभग आभास होने लगा था कि भाजपा नीत एनडीए कश्मीर में कुछ बड़ा करने जा रही है। यही कारण था कि दोनों दलों ने केंद्र सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया। धारा 370 और 35ए को हटाने के संदर्भ में महबूबा ने धमकी देते हुए कहा 'पहले से ही जम्मू-कश्मीर बारूद के ढेर पर बैठा है यदि ऐसा होता है तो न केवल कश्मीर बल्कि पूरा देश जल उठेगा इसलिए मैं बीजेपी से अपील करती हूं कि वह आग से खेलना बंद कर दें।' स्पष्ट है कि महबूबा ने अपनी तरफ से सरकार को डराने की पूरी कोशिश की। यही नहीं उमर अब्दुल्ला ने कहा 'धारा 370 हटाई तो कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा इसे हटाने का काम केवल संविधान सभा कर सकती है जिसने इसे विशेष रियासत बनाया'। अलगाववादी जेकेएलएफ के चीफ यासीन मलिक ने कहा 'यदि धारा 370 हटाई तो जम्मू कश्मीर में आग लग जाएगी कश्मीर जल उठेगा'। वस्तुतः जितने भी नेता इसका विरोध करते थे वह सब अंदर से डरे हुए थे क्योंकि वे जानते थे कि धारा 370 हटाना भाजपा का कोर इशु रहा है और जो संकल्प वह लेती है उसे जरूर पूरा करती है। आखिर में 5 अगस्त 2019 को वह शुभ दिन आया जब संसद ने धारा 370 और 35ए से जम्मू कश्मीर को मुक्त करा दिया और जम्मू कश्मीर के बड़े नेताओं और अलगाववादियों को एहतियात के तौर पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए नजरबंद या गिरफ्तार कर लिया। यही नहीं जम्मू कश्मीर की इंटरनेट सेवाएं स्कूल और संस्थाएं एहतियातन बंद कर दिए गए।

       किसी गंभीर स्थिति को सामान्य होने में वक्त लगता है। जम्मू कश्मीर में सेवाएं बहाल की गईं तब तक लगभग 1 साल पूरा हो गया था। धीरे-धीरे नजरबंद नेताओं को रिलीज किया गया। पहले अब्दुल्ला पिता पुत्र और बाद में 13 महीने बाद महबूबा मुफ्ती को रिहा किया गया। बौखलाए ये नेता भारत विरोध में चिल्ला रहे हैं। अब्दुल्ला जहां एक ओर चीन की मदद से 370 बहाल कराना चाहते हैं तो महबूबा ने कहा ‘ 370 की बहाली तक तिरंगा हाथ में नहीं लूंगी। तिरंगे से हमारा संबंध जम्मू कश्मीर के झंडे की वजह से है, जब तक 370 बहाल नहीं होता, जम्मू कश्मीर को उसका पुराना स्टेटस नहीं मिलता चुनाव नहीं लडूंगी।' केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा 'चोर डाकू कितना ही बड़ा और खूंखार हो मगर जब वह डाका डालता है तो उसको वह माल लौटाना पड़ता है। 5 अगस्त को डाका डाला गया वह किसी कानून के तहत नहीं हुआ। इनके हाथ में तो वह ताकत नहीं कि 370 और 35ए छीन सकें। मैं लोगों को यकीन दिलाना चाहती हूं कि छीनी हुई चीज लोगों के पास वापस आ जाएगी।‘ सच्चाई यही है कि इनके भड़कने या गुपकार गुट बना लेने से धारा 370 बहाल होने से रही। जम्मू कश्मीर में इन सब का विरोध करते हुए 26 अक्टूबर को पूरी कश्मीर में देशभक्त लोगों ने प्रदेश में तिरंगा फहरा कर स्पष्ट कर दिया कि जो प्रावधान खत्म किए गए वह बहाल नहीं होंगे। वस्तुतः अब इन दोनों सियासी परिवारों की राजनीति खत्म हो गई है। यह यदि भारत के कश्मीर राज्य में भारत के नागरिक बनकर राजनीति करेंगे तो इनका स्वागत होगा अन्यथा अलगाववादियों की तरह इन्हें भी भारतीय कानून के तहत बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। इन्हें पुरानी तथाकथित जम्मू कश्मीर रियासत के रद्दी झंडे को भूलना होगा और तिरंगे का सम्मान करना होगा। अब कश्मीर में बदलाव दिखाई देने लगा है। पीडीपी के तीन वरिष्ट नेताओं क्रमशः टीएस बाजवा, वेद महाजन और हुसैन अली बाफरा  ने महबूबा के तिरंगे के अपमान वाले बयान पर पार्टी से इस्तीफा देकर बता दिया कि वे देश विरोधी महबूबा के साथ नहीं रह सकते। 

                                   सेवा निवृत प्राध्यापक (समाजशास्त्र),

                                131/2 एम.बी.नगर, रतलाम (मप्र) 457001

 

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

आन्दोलन करो या चीन की मदद लो, 370 तो बहाल नहीं होगी 

 

                आन्दोलन करो या चीन की मदद लो, 370 तो बहाल नहीं होगी 

                                           


                                                            डॉ.हरिकृष्ण बड़ोदिया

        लगभग 40 मिनट के फारूक अब्दुल्ला के 'द वायर' के करण थापर को दिए इंटरव्यू ने यह स्पष्ट कर दिया कि सांप को कितना भी दूध पिलाया जाए वह हमेशा जहर ही उगलता है। कश्मीर पर शेखअब्दुल्ला की तीन पीढ़ियों के शासन करने वाला अब्दुल्ला परिवार न केवल  एक देशद्रोही  है बल्कि पूरा परिवार कश्मीर के लोगों का हित चिंतक नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के अंधे कुएं में डूबा शातिर परिवार है। यह ऐसा परिवार है जो अपने स्वार्थ के अलावा और कुछ ना तो जानता है और ना ही करता है। यह ऐसा परिवार है कि जब यह सत्ता में होता है तब देशभक्ति की बड़ी-बड़ी बातें करता है, तब कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानता है लेकिन जब यह परिवार सत्ता से बाहर होता है तब यह पाकिस्तान के गुण गाने लगता है। यह ऐसा गिरगिट है जो इतने रंग बदलता है कि गिरगिट भी शरमा जाए। फारूक पिता पुत्र इतने शातिराना हैं कि इनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। दोनों पिता-पुत्र अपने हितों को आगे रखकर बयान देने में माहिर हैं। कहां किस को संतुष्ट करना है, यह अच्छी तरह जानते हैं। यही कारण है कि एक ही मुद्दे पर पिता-पुत्र कभी-कभी अलग बयान देते देखे जा सकते हैं। जब संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी दी गई थी तब फारूक अब्दुल्ला यूपीए सरकार में मंत्री थे और उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री। तब फारूख अब्दुल्ला ने अफजल की फांसी को सही ठहराया था जबकि मुख्यमंत्री उमर ने कहा था अफजल को फांसी नहीं दी जानी चाहिए थी।

         फारूक अब्दुल्ला खुलेआम पाकिस्तान का समर्थन करने वाले देशद्रोही राजनेता हैं। जब जब भी किसी देशभक्त राजनेता ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत का बताने का प्रयास किया तब तब फारूक अब्दुल्ला पाकिस्तान के साथ खड़े नजर आए। 2017 में उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर बयान  दिया "पाकिस्तान ने चूड़ियां नहीं पहनी हैं, उसके पास भी परमाणु बम है। वह भारत को जम्मू कश्मीर के अपने कब्जे वाले हिस्से पर नियंत्रण नहीं करने देगा। फारुख ने कहा पीओके पाकिस्तान का है। हम कब तक कहते रहेंगे कि पीओके भारत का है। यह पीओके उनके (मोदी के) बाप की जागीर नहीं है। पीओके पाकिस्तान में है और यह जम्मू कश्मीर भारत में है।" अब्दुल्ला ने कहा "70 साल हो गए लेकिन भारत पीओके को हासिल नहीं कर पाया, वह (भारत) यदि दावा करता है तो पीओके हासिल कर लीजिए हम भी देखेंगे। पाकिस्तान इतना कमजोर नहीं है, उसने चूड़ियां नहीं पहनी हैं, उसके पास भी एटम बम है।" फारूक अब्दुल्ला के इस  बयान का अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो लगेगा कि जिस गति और दमदारी से मोदी सरकार ने पाकिस्तानी आतंकवाद को हर मोर्चे पर सबक सिखाया है उससे कश्मीर के सियासतदां खासतौर से अब्दुल्ला और मुफ्ती  परिवार डरे हुए हैं, उन्हें लगता है कि यदि भारत ने पीओके पर कब्जा कर लिया तो पूरा जम्मू कश्मीर भारत का हो जाएगा और उनकी पहचान समाप्त हो जाएगी। इसलिए खुद डरा हुआ फारूख भारत को पाकिस्तान के परमाणु बम का बार-बार बखान कर डराने का प्रयत्न करते हुए नजर आता है।

      वस्तुत: पाकिस्तानी पिट्ठू अब्दुल्ला परिवार अपने स्वार्थ की खातिर पीओके को भारत का हिस्सा मानने को सपने में भी तैयार नहीं दिखता। अब्दुल्ला कहते हैं “पीओके पाकिस्तान का है, दोनों देश कितने भी लड़ लें यह हकीकत बदलने वाली नहीं है। मैं (फारुख) केवल भारत से नहीं कहता बल्कि पूरी दुनिया से कहता हूं कि जम्मू कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के पास है वह पाकिस्तान का है और जो हिस्सा इस तरफ है वह भारत का है। यह बदलेगा नहीं। भारत कितनी भी लड़ाइयां लड़ लें इसमें बदलाव नहीं होगा”। असल में अब्दुल्ला परिवार को पीओके से ज्यादा खुद की सियासत की चिंता है। लेकिन 5 अगस्त 2019 को फारूक अब्दुल्ला को समझ आ गया होगा कि मोदी सरकार जो कहती है वह करती है और जो नहीं कहती वह जरूर करती है। जब जब भी अनुच्छेद 370 और 35ए हटाने की मोदी सरकार ने प्रतिबद्धता दिखाई तब-तब अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार ने सांप बिच्छू से डराने का प्रयत्न किया। किसी ने कहा कश्मीर जल उठेगा तो किसी ने कहा यह आग से खेलना है और पूरा भारत जल उठेगा। लेकिन ना केवल यह दोनों प्रावधान अब इतिहास का हिस्सा हो गए बल्कि एक नए जम्मू कश्मीर का उदय हुआ जिसमें लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बन गया।

    अगस्त 19 से नजरबंद अब्दुल्ला को 13 मार्च 20 को, उमर अब्दुल्ला को 24 मार्च को और महबूबा मुफ्ती को 13 अक्टूबर को रिहा करने के बाद से अब ये सियासतदां परेशान हैं कि उनके हाथ से राजशाही अब समाप्त हो चुकी है। जिसके लिए यह किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, भले ही इन्हें देशद्रोही क्यों न कहा जाए। अब्दुल्ला परिवार इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि अब उनके पास वह कश्मीर नहीं जिसे उन्होंने चार हाथों से लूट कर, जनता के हाथों में आतंकवादियों का सफाया करने वाली सेना पर हमला करने के लिये पत्थर थमाए, जिस पर कभी खुद ने तो कभी बेटे ने राज किया। अब उनके सामने ऐसा कश्मीर है जिसके पास कोई स्वतंत्र दर्जा नहीं है, जिसका कोई अलग झंडा नहीं है, जिसके पास 370 और 35ए के विशेष प्रावधान नहीं हैं। यह ऐसा कश्मीर है जो भारत के अन्य राज्यों की तरह है। जिसके दो भाग हो गए, एक जम्मू कश्मीर तो दूसरा लद्दाख। यह देखकर फारूक अब्दुल्ला परिवार विचलित है। यही कारण है कि फारूक अब्दुल्ला ने 23 सितंबर को द वायर टीवी के करण थापर को दिए इंटरव्यू में देशद्रोही बयानों से भी परहेज नहीं किया। इंटरव्यू  में  फारूख जितना जहर उगल सकते थे उन्होंने उगला। फारूक अब्दुल्ला कश्मीर में धारा 370 और 35ए बहाल करने की मांग करते हैं। इतना स्वार्थी और देशद्रोही नेता दुनिया के किसी भी देश में नहीं मिलेगा जो कहे कि “वह भारत को अपना देश नहीं मानते।“ फारूख कहते हैं "वे खुद को भारतीय नहीं मानते और ना ही भारतीय होना चाहते" यही नहीं वह यहां तक कहते हैं कि "कश्मीरी लोग भी अपने आप को भारतीय नहीं मानते और वह भारत के साथ नहीं रहना चाहते।" लगता है कई सालों तक राज करते हुए अब्दुल्ला खुद को ही कश्मीर मानने लगे। कश्मीरी जनता तो कल भी भारतीय थी और आज भी भारतीय है। हां ना तुम(अब्दुल्ला परिवार) पहले भारतीय थे और ना अब हो। तुम कल भी पाकिस्तानी थे और आज भी पाकिस्तानी हो और ऐसे देश विरोधियों से निपटना मोदी अच्छी तरह जानते  हैं। क्या कश्मीर के सियासतदां नहीं जानते कि भाजपा ने मुफ्ती के साथ मिलकर सरकार बना कर सारे सियासतदाओं को निपटा दिया है। 

फारूक अब्दुल्ला आगे कहते हैं  यदि ईमानदारी से कहूं तो मुझे हैरानी होगी, अगर उन्हें (सरकार को) वहां कश्मीर में कोई ऐसा शख्स मिल जाए जो खुद को भारतीय बोले।“ वे कहते हैं "आप जाइए और खुद बात कीजिए वे(कश्मीरी) खुद को भारतीय नहीं मानते और ना ही पाकिस्तानी। पिछले साल 5 अगस्त को उन्होंने (मोदी ने) जो किया वह ताबूत में आखिरी कील था। फारूख ने यह भी कहा "यह वहां के लोगों का मूड है क्योंकि कश्मीरियों को सरकार पर कोई भरोसा नहीं रह गया। विभाजन के वक्त घाटी के लोगों का पाकिस्तान जाना आसान था लेकिन तब उन्होंने गांधी के भारत को चुना, ना कि मोदी के भारत को।" वे आगे कहते हैं "आज चीन दूसरी तरफ से आगे बढ़ रहा है, अगर आप कश्मीरियों से बात करेंगे तो कई लोग चाहेंगे कि चीन भारत में आ जाए। जबकि उन्हें पता है कि चीन ने मुसलमानों के साथ क्या किया। मैं इस पर गंभीर नहीं हूं लेकिन मैं ईमानदारी से कह रहा हूं जिसे लोग सुनना चाहते हैं।" वस्तुतः फारूक अब्दुल्ला कश्मीरियों की आड़ लेकर अपने मन की बात कहते हुए लगते हैं। वे चाहते हैं कि चीन लद्दाख पर हमला कर दे और भारत उसमें हार जाए जिससे वह चीन की तरफदारी में कसीदे पढ़ने लगें। फारूख ने धारा 370 पर भी विवादित नजरिया रखा, उनका कहना है कि "एलएसी पर जो तनाव है उसका जिम्मेदार केंद्र का वह फैसला है जिसमें जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म किया गया", उन्होंने कहा कि चीन ने अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले का समर्थन नहीं किया है और हमें उम्मीद है इसे 370 को फिर से चीन की मदद से बहाल कराया जा सकेगा। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव की जो स्थितियां बनी है वह 370 के अंत के कारण बनी हैं। चीन ने कभी इस फैसले को स्वीकार नहीं किया। हम उम्मीद करते हैं कि चीन की मदद से जम्मू कश्मीर में फिर अनुच्छेद 370 बहाल होगा। 5 अगस्त 2019 का 370 को हटाने का फैसला हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।" सच्चाई तो यह है अब्दुल्ला साहब कि तुम्हारे मानने या ना मानने से या तुम्हारे स्वीकार करने या ना करने से कुछ होना जाना नहीं है क्योंकि यह फैसला तुम ना तो कभी स्वीकार करोगे और ना ही यह फैसला बदला ही जाएगा। 

कुल मिलाकर नए कश्मीर से बौखलाए कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार और  महबूबा मुफ्ती केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने के लिए साथ आ रहे हैं। यही कारण है कि जैसे ही 13 अक्टूबर को महबूबा मुफ्ती रिहा हुईं दोनों बाप बेटे उनके निवास पर पहुंच गए और सरकार के विरुद्ध रणनीति बनाने के लिए प्रतिबद्धता जताने लगे। 5 पार्टियों ने मिलकर गुपकार घोषणापत्र (गुपकार डिक्लेरेशन) तैयार किया। इस घोषणा पत्र के माध्यम से इन लोगों ने अलगाववाद का राग ही नहीं अलापा बल्कि धारा 370 की बहाली, जम्मू कश्मीर और लद्दाख के वर्तमान विभाजन को रद्द करने और प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने की चेतावनी दी है।

 वस्तुतः यह चेतावनी तो यूं ही खारिज कर दी जानी चाहिए। जब ये लोग स्वयं को भारतीय ही  नहीं मानते तो किस मुंह से धारा 370 बहाल करने की मांग कर सकते हैं। जब यह लोग भारत के दुश्मन चीन की मदद से बहाली की बात करते हैं तो इन्हें यही करना चाहिए। देखते हैं किसमें कितना दम है। जम्मू कश्मीर के सियासतदानों को समझ लेना चाहिए कि यह मोदी सरकार है। यदि शांत नहीं रहे तो अभी तो 13 महीने के लिए अंदर किया था पता नहीं आगे इतिहास में दर्ज शेख अब्दुल्ला की तरह 10 सालों तक अंदर रहना पड़े।

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