शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

मोदी ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें कोई इग्नोर नहीं कर सकता

 

           मोदी  ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें कोई इग्नोर नहीं कर सकता

                (टाइम मैगजीन मोदी पर हमेशा विरोधाभासी सामग्री छापती है)

                            


डॉ हरीकृष्ण बड़ोदिया

       पिछले सप्ताह दुनिया की सर्वाधिक लोकप्रिय राजनीतिक मैगजीन ‘टाइम’ ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली 100 लोगों की सूची प्रकाशित की। इसे उसकी मजबूरी कहें या तटस्थ मूल्यांकन कि 2014 से अब तक लगातार पत्रिका कभी कवर पेज पर तो कभी प्रमुखता से भारत के प्रधानमंत्री मोदी को बराबर स्थान देती आई है। अब तक उसने मोदी को चार बार दुनिया के प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया है। पिछले सितंबर महीने में उसने मोदी को चौथी बार विश्व की प्रभावशाली शख्सियत निरूपित किया, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हर बार ‘टाइम’ को मोदी में कमियां ढूंढने की लत पड़ गई है। हालांकि यह पत्रिका मोदी को भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी विशेष महत्व देती रही है। यही कारण है कि ‘टाइम’ पत्रिका मोदी को कभी इग्नोर नहीं कर सकी। लेकिन विशेष बात यह है कि जहां एक ओर पत्रिका मोदी में विशेषताओं के दर्शन करती है वहीं उनमें जानबूझकर ऐसी कमियों का उल्लेख करती है जो मोदी की कार्यप्रणाली से मेल नहीं खातीं। इस तरह का विरोधाभास जिसमें किसी व्यक्ति को एक ही समय में दुनिया का प्रभावशाली बताते हुए उसकी उसी समय अनावश्यक आलोचना भी करे यह केवल ‘टाइम’ ही कर सकती है।

      उदाहरण के लिए 2012 में टाइम मैगजीन ने जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब अपने कवर पेज पर लिखा था 'मोदी मींस बिजनेस' अर्थात मोदी का मतलब व्यापार है, जिसका आशय मोदी एक व्यापारी हैं। इस हेड लाइन के नीचे पत्रिका ने मोदी की योग्यता पर प्रश्न करते हुए छोटे अक्षरों में लिखा 'बट कैन ही लीड इंडिया, अर्थात क्या मोदी देश का नेतृत्व कर सकते हैं? लगता है निश्चित ही पत्रिका ने 2012 में इस संभावना को भांप लिया था कि आने वाले वक्त में मोदी देश का नेतृत्व कर सकते हैं। तभी उसने यह प्रश्न उछाला था, क्या मोदी देश का नेतृत्व कर सकते हैं? पत्रिका ने जब प्रश्न किया था तब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। आज वे देश के विगत 6 वर्षों से अधिक से प्रधानमंत्री हैं और दुनिया जानती है कि मोदी ने भारत को गौरवान्वित कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज दुनिया के महत्वपूर्ण देशों से भारत के अच्छे संबंधों के पीछे मोदी की कार्यप्रणाली और बेखौफ नेता की छवि है। 2014 के चुनावों में जब उन्होंने एनडीए के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तब भी विश्व स्तर पर यही अनुमान था कि एक राज्य का मुख्यमंत्री होना और देश का प्रधानमंत्री होना दोनों में बहुत अंतर है, और क्या मोदी देश का नेतृत्व कर पाएंगे। लेकिन सारी आशंकाएं फिजूल साबित हुईं और मोदी ने देश का नेतृत्व पिछले सभी प्रधान मंत्रियों की तुलना में अच्छा किया, जिसका लोहा आज दुनिया मान रही है।

       टाइम मैगजीन ने 2015 में फिर विरोधाभासी मूल्यांकन किया। टाइम के कवर पेज पर फिर एक बार मोदी थे, जिसमें लिखा गया था 'व्हाय मोदी मैटर्स' अर्थात मोदी इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं। लेकिन इसी के नीचे पत्रिका ने लिखा कि 'कैन ही डिलीवर' क्या वे अच्छा काम कर पाएंगे? अर्थात पत्रिका को हमेशा आशंका बनी रही कि मोदी देश का नेतृत्व करने में सक्षम होंगे या नहीं। लेकिन मोदी ने 2014 के बाद लगातार 2019 के चुनावों से अब तक न केवल देश का नेतृत्व किया बल्कि वैश्विक आतंकवाद के नाश में उन्होंने दुनिया का नेतृत्व किया। उनके वैश्विक नेतृत्व का परिणाम ही है कि आज समूचा विश्व आतंकवाद और आतंकवादी देशों के खिलाफ एकजुट है। पिछले साल टाइम पत्रिका ने अपने कवर पेज पर मोदी के फोटो के नीचे लिखा 'इंडियाज डिवाइड इन चीफ' अर्थात भारत को बांटने वाला प्रमुख और इसी के नीचे छोटे अक्षरों में लिखा गया 'मोदी द रिफॉर्मर', मोदी एक सुधारक। कहने का तात्पर्य यही है कि टाइम मैगजीन मोदी की गंभीर आलोचना करती है किंतु उनमें इतनी संभावनाएं देखती है कि पत्रिका उन्हें इग्नोर नहीं कर पाती। 'इंडियाज डिवाइडर इन चीफ' एक भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह और पाकिस्तानी नेता व कारोबारी सलमान तासीर के बेटे आतिश तासीर ने लिखा था। आतिश तासीर की पृष्ठभूमि और उनकी पाकिस्तान के प्रति निष्ठा को देखकर यही उम्मीद की जा सकती थी कि वह मोदी को देश बांटने वाला प्रमुख ही निरूपित कर सकते थे। लेकिन इसके विपरीत इसी पत्रिका ने एक लेख में 'मोदी हैज यूनाइटेड इंडिया लाइक नो प्राइम मिनिस्टर इन डिकेड्स' बताया अर्थात मोदी ने भारत को जितना एकजुट किया उतना दशकों में किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया।

     इस बार टाइम मैगजीन ने पुनः सितंबर में मोदी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया। लेकिन उसके संपादक कार्ल  विक ने मोदी की आलोचना करते हुए लिखा "लोकतंत्र की विशेषता इसमें होने वाले स्वतंत्र चुनाव नहीं हैं, वे तो सिर्फ यह बताते हैं कि सबसे ज्यादा वोट किसे मिले। ज्यादा महत्वपूर्ण उन लोगों के अधिकार हैं जिन्होंने जीतने वाले के पक्ष में वोट नहीं किया। भारत पिछले 7 दशकों से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां की 1.3 अरब लोगों की आबादी में ईसाई, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन और कई अन्य धर्म के लोग रहते हैं। सभी भारत में स्वीकार्य रहे हैं, जिसका दलाई लामा भी शांति और स्थायित्व का उदाहरण बताते हुए तारीफ करते हैं।“ लेकिन लेख में मोदी को मुसलमानों के खिलाफ बताते हुए लिखा कि “भारत के लगभग सभी प्राधान मन्त्री  80% हिंदू आबादी से ही रहे हैं। लेकिन सिर्फ मोदी ने ही इस तरह से शासन किया है जैसे कोई और मायने नहीं रखता। पहले उनका चुनाव सशक्तिकरण जैसे लोकप्रिय वादे पर हुआ। उनकी राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी ने ना सिर्फ उत्कृष्टता बल्कि विशेष तौर पर भारत के मुस्लिमों को निशाना बनाकर बहुलतावाद को भी अस्वीकार कर दिया। मुस्लिम समुदाय नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी के निशाने पर रहा।"  जबकि सच्चाई बिल्कुल इसके विपरीत है। मोदी ना तो  डिवाइडर इन चीफ हैं और ना बीजेपी मुस्लिम विरोधी है। असल में देश के मुसलमानों में विश्वास का संकट है। वे मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में अब तक स्वीकार नहीं कर पाए, जबकि 2014 के बाद से ही मोदी देश में 'सबका साथ, सबका विकास' की बात करते रहे हैं। वे मुस्लिम बच्चों की तरक्की के लिए कहते हैं कि उन्हें बदलना होगा, वे तब तक मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सकते जब तक उनके एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कंप्यूटर ना हो। सच्चाई तो यह है कि मोदी ने जो कठोर कदम उठाए वह भारत की एकता और अखंडता के लिए जरूरी थे। अब यदि इन्हें मुस्लिम तबका अपने ऊपर आघात माने तो यह उसकी मर्जी है। उदाहरण के लिए कश्मीर से धारा 370 को हटाना या मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति जैसे कानून देश के लिए आवश्यक और बेहतरी के लिए हैं। दूसरी ओर नागरिकता संशोधन कानून जिसके अंतर्गत विदेशों में प्रताड़ित गैर मुस्लिमों को भारत में नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया जिसका भारत के मुसलमानों से कोई संबंध नहीं है उसे भी भारतीय मुसलमानों ने अपने विरुद्ध माना। यही नहीं जितनी भी जन कल्याण की योजनाएं हैं उनमें भारत में किसी संप्रदाय से कोई भेदभाव नहीं है। वे सारी सुविधाएं और लाभ जो अन्य को मिलते हैं, देश के मुसलमानों को भी मिल रहे हैं। तो भी देश का मुसलमान संतुष्ट नहीं है, और उसका प्रमुख कारण यह है कि देश के प्रधानमंत्री मोदी तुष्टीकरण में विश्वास नहीं करते। जिसकी पीड़ा मुस्लिम संभ्रांत वर्ग और कट्टरपंथीयों को अधिक है। जिसकी वजह से उनका,  मोदी विरोध स्थाई हो गया है। इस विरोध को देश ने शाहीन बाग प्रदर्शन में देखा जिसने शाहीन बाग के कई किलोमीटर क्षेत्र की जनता के जीवन को अस्त-व्यस्त और त्रस्त कर दिया था। जिस प्रदर्शन की 82 वर्षीय दादी बिलकिस वानो को टाइम ने प्रभावशाली लोगों की सूची में मोदी के साथ ही शामिल किया है। क्या यह नहीं माना जाए कि टाइम ने भी गैरकानूनी धरने प्रदर्शन को मान्यता देकर देश के नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों को महिमामंडित करने का काम किया है। मोदी की प्रशंसा के साथ गंभीर आलोचना से किसी को कोई आपत्ति नहीं किंतु देश की एकता और अखंडता को सोची समझी रणनीति के तहत हानि पहुंचाई जाए तो लगता है कि विदेशी मीडिया भी भारत के टुकड़े टुकड़े गैंग की भाषा बोल रहा है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि ऐसे प्रयत्नों का ना तो मोदी की सेहत पर कोई असर पड़ता है और ना जनता में उनकी छवि धूमिल होती है और ना कभी होगी। कौन नहीं जानता कि देश के एकजुट विपक्ष के सारे प्रयत्न और प्रचार के बाद भी 2019 में मोदी ने दोबारा बहुमत पाया। मोदी ने 2014 में 'सबका साथ, सबका विकास' नारा दिया था और 2019 में चुनावों में सफलता के बाद नारा दिया 'सबका साथ, सबका विकास और सब का विश्वास'। वस्तुतः यह केवल नारा नहीं बल्कि मोदी का देश के हर नागरिक को आश्वासन है। अब यह लोगों पर निर्भर करता है कि वे विश्वास करते हैं या नहीं।  

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मंगलवार, 29 सितंबर 2020

हर्ड इम्युनिटी (सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता) दिलाएगी कोरोना से निजात

 

            हर्ड इम्युनिटी (सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता) दिलाएगी कोरोना से निजात   

                                                    


डॉ.हरिकृष्ण बड़ोदिया   

       कोरोना महामारी का कहर जारी है। मरीजों की लगातार बढ़ रही संख्या और कम पड़ती स्वास्थ्य सुविधाएं आम नागरिकों को डराने के लिए काफी हैं। लेकिन डर वही ज्यादा रहे हैं जो रोज कोरोना मीटर से कोरोना अपडेट देख रहे हैं। अन्यथा तो अनलॉक की अवधि और क्षेत्र जैसे जैसे बढ़ता गया वैसे-वैसे लोग लापरवाह और निडर होते गए। बाजार में बढ़ती भीड़, बेख़ौफ़  घूमते लोग, बिना मास्क लगाए घूमते लोग, 2 गज दूरी के बिना एक दूसरे से झगड़ते, धक्के देते और धक्के खाते लोग, राजनेताओं के आसपास खड़े लोग, चौराहे पर हो रही चुनावी सभाओं में खड़े लोगों को देखकर ऐसा लगता ही नहीं है कि देश में कोरोना जैसी भयावह बीमारी है जो किसी व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में ले ले तो उसका बचना भगवान की कृपा पर ही निर्भर है। यह हो रहा है और तब तक होता रहेगा जब तक लोग लापरवाही नहीं छोड़ेंगे। इस लापरवाही का एक दुष्परिणाम यह है कि मरीजों की संख्या रात दिन बढ़ती जा रही है और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी होती जा रही है। अस्पतालों में बिस्तर की कमी होने लगी है। सरकार ने मरीजों की कैटेगरी बना दी है। कम गंभीर मरीजों को घर में ही क्वॉरेंटाइन कर उपचार किया जा रहा है। जो लोग संक्रमित हो रहे हैं वे ज्यादा डर रहे हैं और जो नहीं डर रहे हैं वे संक्रमितों की संख्या बढ़ा रहे हैं। यह आज की स्थिति है जो देश के हर कोने में देखी जा रही है।

      रविवार तक भारत में कोरोना मरीजों की कुल संख्या 60 लाख 74 हजार  703  है। वहीं अब तक मरने वालों की संख्या 95542  है। चीन के वुहान में दिसंबर 2019 को जब कोरोना वायरस का पहला प्रकरण आया था तब से आज तक कुल मरीजों की संख्या 85 हजार के लगभग है, जबकि भारत में जब 30 जनवरी 2020 को कोरोना मरीज का पहला प्रकरण आया था तब से अब तक मरीजों की संख्या 60 लाख से अधिक हो चुकी है और मरने वालों की संख्या चीन के कुल संक्रमितों की संख्या से अधिक है। हालांकि दुनिया भर में कोरोना से जंग जीतने वाले भारत में सबसे अधिक हैं। इन लोगों की संख्या दुनिया में पहले स्थान पर है, कारण स्पष्ट है कि भारत के नागरिकों की इम्युनिटी विश्व के अन्य देशों के नागरिकों से अधिक है और इसका प्रमुख कारण यहां के अधिकांश लोगों का शाकाहारी होना है। देश में पिछले 24 घंटों में ठीक हुए लोगों की संख्या 95 हजार से अधिक है। भारत में अब तक ठीक हुए लोगों की कुल संख्या 49 लाख से अधिक है। यह रिकवरी रेट 82 प्रतिशत के लगभग है। वस्तुतः मरीजों के ठीक होने के मामले में भारत अमेरिका से आगे है जो यह बताता है कि उपचार सही दिशा में हो रहा है।

      आज सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है। महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण के 18056 नए मामले सामने आए हैं जिसके साथ कुल संक्रमितों की संख्या रविवार तक 13 लाख से अधिक हो गई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब तक कुल मरने वालों की संख्या 35751 हो गई।महाराष्ट्र के अलावा आंध्रप्रदेश  में 4.55 लाख, तमिलनाडु में 4.39 लाख, कर्नाटक में 3.6 लाख, उत्तर प्रदेश में 2.4 लाख, दिल्ली में 1.79 लाख, पश्चिम बंगाल में 1.68 लाख, बिहार में 1.4 लाख, तेलंगाना में 1.33 लाख असम में 1.5 लाख और उड़ीसा में 1.09 लाख संक्रमित हैं। इस प्रकार अब तक 11 राज्यों में संक्रमितों की संख्या एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है और बारहवां राज्य गुजरात होने जा रहा है जहां अब तक 99 हजार  मामले आ चुके हैं।

     मध्यप्रदेश में अब तक संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख से अधिक हो गई है। स्वस्थ होने वालों की संख्या 1 लाख से अधिक है जिसका प्रतिशत 80  है। मरने वालों की प्रदेश में संख्या 2242 है। वस्तुतः यह एक उल्लेखनीय बात है कि मार्च में मरने वालों का प्रतिशत 7 था जो अब घटकर 1.4 प्रतिशत हो गया है। इस प्रतिशत से दो बातें संभावित है, एक तो यह कि या तो कोरोना की घातकता कम हो गई हो सकती है या दूसरी यह कि उपचार सही दिशा में हो रहा है। पिछले दिनों एक संक्रमण से ठीक हुए मरीज से बात करने पर जानने को मिला कि उन्हें जब सूंघने में लगा कि कुछ अनुभव नहीं हो रहा तो स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर जांच करवाई। तत्काल पद्धति से उन्हें कोरोना पॉजिटिव बताया गया। ऐसी स्थिति में उन्हें जिला चिकित्सालय लाकर कोविड केंद्र पर भर्ती किया गया। उपचार के रूप में उन्हें देसी काढा, विटामिन की गोलियां और पेरासिटामोल दिया गया। नियमित 10 दिन के उपचार के बाद उनका टेस्ट नेगेटिव आया और उन्हें डिस्चार्ज किया गया। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हीं के सामने एक पेशेंट की मृत्यु भी हुई। एक महत्वपूर्ण बात यह बताई कि मास्क लगवाने और डिस्टेंसिंग के पालन में कठोरता बढ़ती गई। साथ ही प्राणायाम और योगाभ्यास कराया गया। वैसे इसमें कोई शक नहीं कि वर्तमान में कोरोना मरीजों में अलग-अलग तरह के पेशेंट हैं जिन्हें सामान्य और गंभीर मरीजों की श्रेणी में रखा जा सकता है। वैसे मध्यप्रदेश में वीवीआईपी व्यक्तियों में संक्रमण भी किसी से छिपा नहीं है। प्रदेश के मुखिया सीएम शिवराज सिंह सहित लगभग 40 विधायक संक्रमित हो चुके हैं। यही नहीं कोरोना संक्रमण के चलते ब्यावरा के कांग्रेसी विधायक गोवर्धन दांगी का देहावसान हो चुका है।

     वैसे वैज्ञानिकों का मानना है कि सामान्य श्वसन वायरसों (कॉमन रेस्पिरेट्री वायरस) की तरह ही कोविड-19 उन देशों में जहां समशीतोष्ण जलवायु है समय रहते मौसमी बीमारी हो जाएगी। लेकिन यह तभी संभव है जब हर्ड इम्युनिटी की स्थिति बनेगी। हर्ड इम्यूनिटी का अर्थ ‘सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता’ होता है। जैसा कि हमें बताया जाता रहा है कि यदि हमें कोरोना से बचना है तो अपनी इम्यूनिटी यानी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते रहना होगा, अर्थात जब तक वेक्सीन नहीं आता तब तक इम्यूनिटी को मजबूत रखना ही हमें संक्रमण से बचा सकता है। हर्ड इम्यूनिटी का मतलब एक बड़े हिस्से अर्थात 70 से 90 प्रतिशत लोगों में वायरस से लड़ने की ताकत पैदा करना है। जैसे-जैसे वायरस से लड़ने के लिए सशक्त इम्यूनिटी वाले लोगों की संख्या बढ़ती जाएगी वैसे वैसे वायरस का खतरा कम होता जाएगा और इस तरह संक्रमण की चेन टूट जाएगी। इससे वे लोग भी बच सकेंगे जिनकी इम्यूनिटी कमजोर है और जब तक हर्ड इम्यूनिटी स्थापित नहीं होती तब तक हर मौसम में कोरोना वायरस परेशान करता रहेगा।

     लेबनान के बेरुत के अमेरिकन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता हसन जाराकेट का कहना है कि जब तक समुदाय में हर्ड इम्यूनिटी स्थापित नहीं होती तब तक साल भर कोविड-19 बना रहेगा, इसलिए लोगों को इसके साथ रहने की आदत डालना पड़ेगी। सर्वश्रेष्ठ बचाव के तरीकों की आदत डालनी पड़ेगी। जिनमें मास्क पहनना, शारीरिक दूरी मेंटेन करना, हाथों को बार-बार साबुन से धोना और भीड़ बढ़ाने से बचना होगा। दोहा में कतर विश्वविद्यालय के लेखक हादी यासीन कहते हैं कि कोविड-19  के कई दौर तब तक जारी रहेंगे जब तक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त नहीं हो जाएगी। वे आगे कहते हैं कि हम जानते हैं कि श्वसन तंत्र से संबंधित कई वायरस समशीतोष्ण क्षेत्रों में मौसमी होते हैं। उदाहरण के लिए इनफ्लुएंजा और कई तरह के कोरोना वायरस जिनसे सामान्य सर्दी-जुकाम होते हैं और जो सर्दियों में सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। लेकिन ट्रॉपिकल क्षेत्रों अर्थात उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में साल भर परेशान करते हैं। इस प्रकार अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना वायरस से बचाव के लिए या तो वैक्सीन आ जाए या फिर हर्ड इम्यूनिटी पैदा हो जाए। यह दोनों ही स्थितियां हमें वायरस से बचा सकती हैं। जब तक यह दोनों स्थितियां नहीं है तब तक हमें कोरोना वायरस से डरना होगा। तब तक हमें अनिवार्य रूप से मास्क पहनना होगा, शारीरिक दूरी बना कर रखना होगा, हाथों को सैनिटाइज करना या साबुन से बार-बार धोना और इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए इम्यूनिटी बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थो  को भोजन सामग्री में शामिल करना होगा।