बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

सीएए तो बहाना है असली पीड़ा कुछ और है...


            सीएए तो बहाना है असली पीड़ा कुछ और है...

                        डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
       सीएए अर्थात नागरिकता संशोधन कानून 12 दिसंबर 2019 को बना उसके बाद पूरे देश में मुस्लिम तबके में जैसे भूचाल आ गया. जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जेएनयू से निकलकर सरकार विरोधी छात्र सड़कों पर आ गए. देश की राजधानी में आगजनी हिंसा पथराव और प्रदर्शनों का दौर जारी हुआ. इस सबके बावजूद कि नागरिकता संशोधन कानून भारत के किसी भी नागरिक की नागरिकता को प्रभावित नहीं करता, मुस्लिम समुदाय ने इसे मुस्लिम विरोधी करार दिया और सड़कों पर उतर आए. देश के सरकार विरोधी विपक्ष ने मुस्लिम तुष्टिकरण और आम चुनावों में अपनी करारी हार की भड़ास निकालने का इसे सबसे माकूल मौका समझकर सीएए के विरुद्ध प्रदर्शनों को समर्थन देना शुरू कर दिया. कांग्रेस, वामपंथी दलों के साथ मुस्लिम संगठन सक्रिय हो गए. ऐसे में ही 15 दिसंबर को शाहीन बाग में मुस्लिम महिलाओं का धरना प्रदर्शन शुरू हुआ जो आज भी जारी है.
   शाहीन बाग का प्रदर्शन इस मामले में विलक्षण है कि पुरुष प्रधान मुस्लिम समाज ने अपने घर की दादियों, बच्चों और महिलाओं को आगे कर यह सिद्ध कर दिया कि वह अपने वेबुनियादी लक्ष्य को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. शायद यह दूसरा मौका है जब शाहबानो के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध मुस्लिम समुदाय ने देशभर में प्रदर्शन किया था. मुस्लिम समुदाय का मुस्लिम महिला शक्ति का ऐसा इस्तेमाल शायद इतिहास में पहली बार ही सामने आया है. वैसे भारतीय संस्कृति और सभ्यता में महिलाओं को ढाल बनाकर लड़ाई लड़ना शेरदिली तो नहीं कही जा सकती है लेकिन सीएए के विरोध के लिए मुस्लिम समुदाय की यह रणनीति राजनीति की सोची समझी साजिश है
  . शाहीन बाग के धरने ने आसपास के क्षेत्र के लाखों आम नागरिकों की जिंदगी को बंधक बना दिया. शाहीन बाग के धरने ने कालिंदी कुंज, उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के फरीदाबाद आने जाने वाले करीब 20 लाख लोगों को सड़क रोककर प्रभावित किया है. मुस्लिम धरना प्रदर्शन करने वाली महिलाओं का कहना है कि जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाता वह शाहीन बाग नहीं छोड़ेंगी. धरना स्थल के आसपास के  लगभग 100 शोरूम मालिकों को अब तक कई करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है, वे परेशान हैं. दैनिक जागरण की खबर के अनुसार ‘कई कारोबारियों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें बहुत नुकसान हुआ है लेकिन वे प्रदर्शन का विरोध नहीं कर सकते. अगर वे अपनी बात प्रदर्शनकारियों के सामने रखते भी हैं तो उन्हें कौम का गद्दार कहा जाता है. ऐसे में नुकसान बर्दाश्त करना ही उनके पास एकमात्र विकल्प है. क्योंकि कारोबारियों को उन्हीं के बीच रहना है.’
      17 फरवरी को शाहीन बाग से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए लगी याचिकाओं के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह यही था कि प्रदर्शनकारियों का यह अधिकार है कि वह विरोध करें लेकिन यह नहीं हो सकता प्रदर्शनकारी सड़क रोक कर दूसरे लोगों को उनके अधिकार से वंचित करें. यदि सभी लोग धरना प्रदर्शन के नाम पर सड़क जाम कर दें तो क्या होगा. इस टिप्पणी के बाद धरने पर बैठी एक बुजुर्ग मुस्लिम दादी ने प्रेस से बात करते हुए कहा कि जब तक उनकी बात सरकार नहीं मानती, जब तक सीएए, एनपीआर और एनआरसी वापस नहीं लिया जाता हम कोर्ट की भी नहीं मानेंगे. ये दादियां इस सब के पीछे का खेल नहीं समझती उनसे जैसा कहलवाया जाता है वह कह देती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने समस्या के हल के लिए तीन वरिष्ठ वकीलों को मध्यस्था के लिए निर्देश देते हुए 24 फरवरी को पुनः सुनवाई की तारीख तय की है किंतु नहीं लगता कि इस बीच कोई समाधन हो पाएगा.
    वस्तुतः जो स्थिति दिखाई दे रही है वह यही है कि धरने पर बैठी दादियां, नानियाँ, बच्चे और महिलाएं वहां से नहीं हटेंगे. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित सरकार के प्रतिनिधि और प्रवक्ता अपनी जनसभाओं में और  टीवी डिबेट्स में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि इस कानून का देश के नागरिकों से कोई संबंध नहीं और देश के नागरिकों की नागरिकता भी प्रभावित नहीं हो रही है और यह भी कि यह कानून किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा फिर सरकार क्या बात करे. सच्चाई तो यह है यह धरना प्रदर्शन मुस्लिम महिलाओं को ढाल बनाकर मुस्लिम संगठन, कांग्रेस, वामपंथी और ऑल इंडिया मजलिस-ए- इत्तेहादुल मुस्लिमीन अर्थात ओवैसी की पार्टी और मोदी विरोधी करा रहे हैं और सीएए तो बहाना है,असली पीड़ा कुछ और है.
   यह मोदी सरकार के पिछले छह-सात महीने में किए गए महत्वपूर्ण फैसलों- कश्मीर से धारा 370 और 35ए को हटाना, इंस्टेंट तीन तलाक पर रोक का कानून  और राम मंदिर मुद्दे पर मुसलमानों की सुप्रीम कोर्ट में हार की भड़ास है. विरोधी दल इस बात से गंभीर रूप से परेशान हैं कि ये कठोर और शक्तिशाली निर्णय आम जनमानस में मोदी सरकार की दृढ़ता को और ज्यादा मजबूत करते जा रहे हैं. कांग्रेस इस बात से परेशान है कि मोदी सरकार एक-एक कर ऐसे निर्णय ले रही है जिन्हें उसने साठ सालों के अपने शासनकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए उपयोग किया. अगर हम कश्मीर से धारा 370 और 35ए हटाने की बात करें तो भारत के इतिहास में यह निर्णय देश की एकता और अखंडता और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग होने की पुष्टि का निर्णय है. सच्चाई तो यह है कि इस निर्णय ने जम्मू कश्मीर का राजनीतिक हुलिया ही बदल कर रख दिया. जिस कश्मीर पर कुछ पुश्तैनी सियासतदानों का राज था और जो वहां के बेताज बादशाह थे, अब ना तो उनकी बादशाहत रही और ना ही कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा ही रहा. आज जम्मू कश्मीर 1947 के बाद विशुद्ध रूप से भारत का एक केंद्र शासित राज्य बना. इन धाराओं को हटाने के साथ मोदी ने जो सबसे बड़ा काम किया वह यह है कि उन्होंने जम्मू कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया. इससे सरकार ने लद्दाख वासियों को कश्मीरी सियासतदानों के शोषण से मुक्त कराने में सफलता पाई. जिस जम्मू कश्मीर में देश का तिरंगा नहीं लहराया जा सकता था वहां आज न केवल भारत का तिरंगा लहरा रहा है बल्कि लेफ्टिनेंट जनरल की नियुक्ति कर शासन व्यवस्था केंद्र के अधीन हो गई. ऐसी स्थिति में मोदी विरोधी मुंह ताकते रह गए तब क्यों कर मोदी का विरोध ना हो. सच्चाई तो यह है कि यह सारे निर्णय जहां एक और देश की अस्मिता से जुड़े थे वहीं इनसे देश की मुस्लिम कम्युनिटी का गहरा संबंध था. चाहे वह राम मंदिर का मुद्दा हो, तीन तलाक या 370 - 35a का ये सब देश की मुस्लिम कम्युनिटी को प्रभावित करते हैं. इन निर्णयों की उद्घोषणा पर मोदी विरोधियों को चीखने चिल्लाने का मौका नहीं मिल पाया हालांकि विपक्ष ने संसद में इनका पुरजोर विरोध किया.  लेकिन यदि विपक्ष सड़कों पर हाय तोबा करता तो यह राष्ट्र के विरुद्ध कार्य माना जाता. शाहीन बाग धरने से सीएए कानून खत्म करवाने का तो बहाना है वस्तुतः यह राष्ट्रहित में संशोधित या बने कानूनों की पीड़ा है जिसने इन सब विरोधियों को एकजुट करने का काम किया. शाहीन बाग की फंडिंग का कनेक्शन जब पीएफआई से होता है, जब शाहीन बाग समर्थक सरजील इमाम देश से असम को (चिकन नेक) अलग कर देने का बयान देता है तब लगता है कि मुस्लिम दादियां, बच्चे और मोहतरमाएं इस बात से पूरी तरह बेखबर हैं कि इसके पीछे का सच भारत को तोड़ने की साजिश का है. ये महिलाएं और बच्चे अल्लाह की ऐसी गाय हैं जिन्हें देश विरोधी और स्वार्थी तत्वों ने शाहीन बाग़ के खूंटे से बांध दिया है. 65 दिन में अपने ही समुदाय के कारोबारियों का व्यापार ठप्प करना और आम जनजीवन को सड़क बंद कर बंधक बनाना विरोध प्रदर्शन के अधिकार का बेजा इस्तेमाल नहीं तो क्या है. सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों से सही सवाल किया कि यदि इसी तरह का प्रदर्शन सभी सड़कों को बंद कर दे तो क्या होगा. शाहीन बाग देश में अधिकांश लोगों द्वारा पसंद भले ही नहीं किया जा रहा किंतु पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को बहुत पसंद आ रहा है. कट्टरपंथी मुसलमान चाह रहे हैं सरकार किसी भी दशा में उनके सामने झुक जाए किन्तु ऐसा होना संभव नहीं. वस्तुतः शाहीन बाग दिल्ली के चुनावों के लिए रचा गया एक प्रपंच था जिसका उद्देश्य भाजपा को दिल्ली में हराना था और उसमें मोदी विरोधी सफल भी हो गए. लेकिन अब यह धरना ऐसे मुकाम पर पहुँच गया है जहां से मुस्लिम समुदाय सम्मानजनक वापसी चाहता है. किन्तु ऐसा लगता नहीं कि सरकार अपने कदम वापिस लेगी और उसे लेना भी नहीं चाहिए. देखना होगा कि शाहीन बाग़ धरने का अंत सुप्रीम कोर्ट के कठोर निर्णय से होगा या अभी और चलेगा.

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

‘सबका’ विश्वास कभी नहीं मिलेगा भाजपा को


                    ‘सबका’ विश्वास कभी नहीं मिलेगा भाजपा को

  -डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया  
      जिस दिल्ली की जनता ने देश के आम चुनावों में सभी 7 सीटों का भाजपा को उपहार दिया उसी दिल्ली की जनता ने विधानसभा चुनावों में भाजपा को नकार दिया. भाजपा की इस हार ने निसंदेह कई सवाल खड़े कर दिए हैं. भाजपा ने मोदी कार्यकाल में देश हित में ऐसे महत्वपूर्ण फैसले बड़ी कठोरता से किए जिनके होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. चाहे  तीन तलाक का मुद्दा हो या धारा 370 और 35a का, चाहे राम मंदिर का विवाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुलझना हो या नागरिक संशोधन कानून हो इन सबको आत्मविश्वास और कठोरता से लागू करना दिवास्वप्न से कम नहीं था. अगर सर्वेक्षण कराया जाए तो एक विशेष तबके को छोड़कर आम जनता इसके पक्ष में ही खड़ी मिलेगी. स्वाभाविक था ऐसी कंफर्टेबल स्थिति में भाजपा की दिल्ली में सरकार बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अरविंद केजरीवाल दोबारा दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए. अगर गंभीरता से विचार करें तो यह कहा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल की यह जीत 2015 से भी बड़ी जीत है. 2015 में ‘आप’ ने 67 सीटें जीतकर इतिहास रचा था लेकिन इस बार की 62 सीटें 67 सीटों से भी भारी जीत इसलिए कही जा सकती है क्योंकि सारी केंद्रीय सरकार की राष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद उसने मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा को पटखनी दी है.
   भाजपा यह संतोष भले ही कर ले कि उसके वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई लेकिन सरकार बनाने की सारी ख्वाहिशें तो धरी की धरी रह गईं. मतलब साफ है कि दिल्ली की जनता ने राज्य में भाजपा या मोदी-अमित शाह को स्वीकार नहीं किया. देश के आम चुनावों के बाद लगातार प्रदेश में भाजपा सरकारों का हाथ से फिसलना कोई साधारण बात नहीं है. पहले छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाथ से फिसल गया तो 2020 आते-आते महाराष्ट्र और झारखंड हाथ से निकल गया. तो क्या यह माना जाए कि मोदी मैजिक ढलान पर है. लेकिन ऐसा नहीं माना जा सकता क्योंकि राज्य और केंद्र के मुद्दे कभी समान नहीं होते. जो राष्ट्रीय मुद्दे होते हैं वे राज्य के मुद्दों से पर्याप्त भिन्न होते हैं. यही कारण है कि राज्यों में जनता ने भाजपा को उतना समर्थन नहीं दिया जितना कि सरकार बनाने के लिए जरूरी होता है और यह स्थिति आगे भी दिखाई दे तो अचंभा नहीं होगा. केंद्र में जनता ने मोदी को और राज्यों में जनता ने विपक्षियों को मौका दिया . वैसे मोदी का जादू आज भी बरकरार है और यह स्थिति 2024 में दिखाई देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जिस राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय मुद्दों को हल कर रही है उससे उसका जनाधार केंद्र के लिए बढ़ता जा रहा है.
   बात अगर दिल्ली की करें तो साफ दिखाई देता है कि दिल्ली की जनता ने स्थानीय मुद्दों को महत्व दिया. निसंदेह अरविंद केजरीवाल ने यह चुनाव अपनी रणनीतिक कुशलता से जीता है. कौन नहीं जानता कि आप की सरकार ने दिल्ली की जनता से जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हुए हैं फिर भी जनता ने उनमें विश्वास जताया है. अरविंद केजरीवाल ने चुनाव के ठीक 3 महीने पहले से अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया था चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सब में अरविंद केजरीवाल ने ताबड़तोड़ प्रचार किया. चुनाव के 6 महीने पहले से स्वयं को जनता में स्थापित करने के लिए डेंगू की रोकथाम वाला प्रचार विज्ञापन चलाया गया. घर-घर में यह संदेश देने में कामयाबी पाई कि केजरीवाल सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी की व्यवस्था पर अतिरिक्त कार्य कर दिल्लीवासियों की समस्या हल की है. वस्तुतः दिल्ली एक बड़ा क्षेत्र है और आम लोगों की जिंदगी भी चक्रीय है. लोगों को विज्ञापनों की विश्वसनीयता जांचने का इतना समय नहीं कि जाकर देखें कि सच्चाई क्या है. जो विज्ञापनों ने दिखाया उस पर विश्वास किया गया फिर आम जिंदगी के लिए आवश्यक वस्तुओं के लिए मुफ्त सुविधाएं (भले ही वे पर्याप्त ना हों) आखिर उनको मिलीं. चुनाव से एन पहले महिलाओं की डी टी सी बसों में यात्रा मुफ्त  करने का दांव भी निशाने पर बैठा. कुल मिलाकर चुनाव जीतने की जितनी अच्छी रणनीति केजरीवाल ने बनाई वह सफलता का कारण बनी.
   ऐसी स्थिति में जब दिल्ली में शाहीन बाग पर मुस्लिम महिलाओं का सीएए के विरोध में प्रदर्शन चल रहा हो ऐसे में केजरीवाल ने प्रत्यक्ष रूप से उससे दूरी बनाए रखी. केजरीवाल ने अपनी आलोचना का मौका अपने विपक्षियों को नहीं दिया. वहीं  उनके सिपहसालारों जिनमें अमानतुल्लाह का नाम सर्वोपरि है ने मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण करने का काम किया. स्वाभाविक है कि केजरीवाल ने अपने नुमाइंदों से ही सीएए का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन कराया किंतु स्वयं निरपेक्ष बने रहे. वहीं दूसरी ओर भाजपा का यह अनुमान कि उसने विगत 6 महीनों में जो अकल्पनीय निर्णय लिए हैं वह दिल्ली में सरकार बनाने में मदद करेंगे संभव नहीं हो सका. भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दों को प्रचारित कर चुनाव जीतने की  कोशिश की किंतु संभव नहीं हो सका. कहने को कहा जा सकता है कि भाजपा के नेताओं जिनमें प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर का नाम शामिल है ने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए बयान दिए लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा के हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के विपरीत मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण एक मुस्त हुआ.  तो साथ ही भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे को भुनाने में असफल रही.
   एक महत्वपूर्ण बात जो  दिखाई देती है वह यह है कि दिल्ली के इन चुनावों में कांग्रेस ने परोक्ष रूप से भाजपा को पटखनी देने के लिए अरविंद केजरीवाल का साथ दिया. भले ही कांग्रेस ने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन किसी भी विधानसभा सीट में उसने गंभीरता से चुनाव नहीं लड़ा. यह इस बात से स्पष्ट होता है कि लगभग 60 से अधिक विधानसभा सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जप्त हुई है. यही नहीं कांग्रेस ने अंतिम क्षणों में अपने प्रतिबद्ध वोटरों से भाजपा के विरुद्ध ‘आप’ पार्टी के पक्ष में वोट डलवाए.  कांग्रेस ने कुल मिलाकर आत्मघाती कदम ही उठाया जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का वोट भी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को मिल गया.
   वस्तुतःकांग्रेस का मंतव्य स्पष्ट हो गया कि उसे स्वयं की जीत हार की चिंता से अधिक इस बात की चिंता थी कि कहीं भाजपा ना जीत जाए, जिसके लिए उसने अपना जनाधार खोने की भी परवाह भी नहीं की. कांग्रेस के नेताओं के बयानों ने भी स्पष्ट किया कि उसका सरोकार जीतने से ज्यादा मोदी को बदनाम करने का अधिक था. शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों के समर्थन में हमेशा की तरह मणिशंकर अय्यर ने मोदी को ‘कातिल’ की संज्ञा दी तो बेरोजगारी पर प्रहार करने के लिए राहुल गांधी ने  अशिष्टता की सीमाएं लांघते हुए कहा कि ‘यह जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 या 8 महीने बाद यह घर से बाहर नहीं निकल पाएगा. हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे कि हिंदुस्तान के युवा को रोजगार दिए बिना यह देश आगे नहीं बढ़ पाएगा.’ ऐसे बयानों से कांग्रेस को ह पहले भी हानि होती रही है और आगे भी होती रहेगी जिसका लाभ आम चुनावों में पहले भी भाजपा को मिला और आगे भी मिलता रहेगा. लेकिन दिल्ली चुनावों में भाजपा को लाभ नहीं मिल पाया, ना तो राष्ट्रवाद का लाभ मिल पाया और ना ही उसके द्वारा देश हित में बनाए गए कानूनों का ही लाभ मिल पाया.
    चुनावों के विधानसभावार विस्तृत परिणामों का आना अभी बाकी है लेकिन जो परिणाम हैं वह यह बताते हैं कि अधिकांश भाजपा प्रत्याशी 1000 से कम या दो हजार वोटों के अंतर से हारे हैं. स्पष्ट है यदि कांग्रेस के प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने के लिए प्रयास करते तो भाजपा बहुत सी सीटों पर जीत दर्ज कर जाती, संभव है सरकार भी बन जाती.
    आज कांग्रेस इस बात से दुखी नहीं है कि उसके लगभग सभी उम्मीदवारों की जमानत जप्त हुई बल्कि इस बात से खुश है कि भाजपा हार गई. इस तरह की नकारात्मक राजनीति का यह पहला इतिहास ही होगा. दिल्ली चुनावों के परिणामों को अलग कर यदि वर्तमान में राजनीतिक दलों की स्थितियों का मूल्यांकन करें तो आज भी भाजपा पूरे देश में सबसे आगे है जबसे सीएए आया है तब से यह बात भी स्पष्ट हो गई कि मोदी जिस ‘सबका’(मुस्लिम तबके का) विश्वास की बात कर रहे हैं वह सब का विश्वास ना तो पहले कभी भाजपा के साथ था और ना आज है, और ना आगे कभी रहेगा. हिंदुत्व की विशेषता है कि यह सभी को उदारता से अपने साथ जोड़ता है किंतु अल्पसंख्यक कट्टरतावाद से आप उम्मीद नहीं कर सकते और करनी भी नहीं चाहिए. जिस ‘सबका’ विश्वास जीतने के लिए भाजपा जतन कर रही है उसका दुष्प्रभाव उसके परंपरागत वोटों पर पड़ रहा है जो इधर-उधर छिटक कर भाजपा को हानि पहुंचाने का काम कर रहा है. भाजपा जैसी थी वैसी ही बनी रहे तो ही वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकती है.
   भाजपा दिल्ली भले ही हार गई हो किंतु दिल्लीवासियों के दिल में बसती है और दिल्ली ही क्या आज देश के आम लोगों के दिलों में बसी है. जरूरत तो इस बात की है कि ऐसे निर्णय आने चाहिए जिसके लिए भाजपा पहचानी जा रही है. कोई माने या ना माने लेकिन तीन तलाक जैसी प्रथा को हटाया जाना समान नागरिक संहिता का एक भाग है और अब यह जरूरी है कि समान नागरिक संहिता के साथ साथ जनसंख्या नियंत्रण जैसे कानून लागू किए जाएं. पूरे देश में एक कानून होना चाहिए जो सब पर लागू हो


शनिवार, 18 जनवरी 2020

विपक्ष ने जो रास्ता चुना है वह आत्मघाती है


                                विपक्ष ने जो रास्ता चुना है वह आत्मघाती है

                                 डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
                अब यह किसी से छिपा नहीं है कि विपक्ष के सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मन केवल और केवल मोदी और अमित शाह हैं. यह भी एक सच्चाई है कि विपक्ष हताश है और इस हताशा में वह ऐसे निर्णय और कदम उठा रहा है जिससे उसका भला कम और नुकसान अधिक हो रहा है. पिछले साल दिसंबर में जब संसद के दोनों सदनों में नागरिक संशोधन बिल पास होकर कानून बना तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश को आगजनी और हिंसा में झोंक दिया जाएगा. असल में इसके पीछे सबसे बड़ा कारण विपक्ष की हताशा ही है.
     सच्चाई तो यह है कि 2014 में देश में जो सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ और जिसने मोदी को देश की बागडोर सौंप दी तब विपक्ष मन मसोसकर रह गया था. उसे लगा था कि यह बड़ा बदलाव 5 सालों के उसके बनवास के लिए है और मोदी जैसा एक क्षेत्रीय नेता देश को चला पाने में अक्षम सिद्ध होगा और वह  स्वत: ही 2019 में अपदस्थ हो जाएगा. लेकिन मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने ना केवल वापसी की बल्कि ऐसा जनादेश प्राप्त किया कि विपक्ष के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. यही नहीं मई 2019 से जनवरी 2020 तक आते-आते मोदी-2 सरकार ने देश हित में जो ताबड़तोड़ फैसले किए उनसे न केवल विपक्ष बल्कि आम जनता की आंखें भी फटी की फटी रह गईं. तीन तलाक, कश्मीर से धारा 370 और 35ए  का हटना और राम मंदिर का मुद्दा सुलझना आदि ने विपक्ष को हतप्रभ कर दिया. आज विपक्ष के सामने अपने अस्तित्व का संकट खड़ा है. इन तीन महत्वपूर्ण निर्णय के खिलाफ विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ था क्योंकि ये ऐसे निर्णय थे जिनके पीछे जनकल्याण और देशहित की भावना थी. यदि इनका विरोध किया जाता तो यह स्पष्ट होता कि विपक्ष जनहित और देशहित के विरुद्ध कार्य कर रहा है. ऐसी स्थिति में नागरिक संशोधन अधिनियम में छिद्रान्वेष्ण को आंदोलन का आधार बनाना यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस, लेफ्ट और बाकी मोदी विरोधी विपक्षी दलों को मुस्लिम समुदाय के कंधों पर बंदूक चलाने के अलावा सरकार के विरोध का कोई और कारण नजर नहीं आया.
    भारतीय राजनीति में छात्र आंदोलन बहुत से बदलावों का आधार रहे हैं. फलत: विपक्ष ने जेएनयू, एएमयू और जामियामिलिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी  से सीएए एनपीआर और एनआरसी का जो कृत्रिम भय पैदा किया वह पिछले एक माह से आगजनी और हिंसा और धरना प्रदर्शन का कारण बना जिसमें वामपंथी छात्रों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. लेकिन अब ऐसे आंदोलनों का जनमानस पर विपरीत प्रभाव हो रहा है. विश्विद्यालय के ये छात्र जब ‘जिन्ना वाली आजादी’ मांगते हैं तो राष्ट्रवाद और मजबूत हो रहा है. देश के मानस में मोदी के प्रति और मजबूती के भाव पैदा हुए हैं. यह पूरी तरह स्पष्ट है कि सीएए देश के किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन नहीं करता. किंतु मोदी विरोधियों ने इसका हौवा खड़ा कर देश के मुस्लिम समुदाय को ढाल बनाकर सरकार के विरुद्ध ताना-बाना खड़ा कर दिया. लेकिन मोदी सरकार पिछले 1 माह से चल रहे इस आंदोलन के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी है जो स्पष्ट करता है कि सरकार मजबूती के साथ अपने निर्णय पर अडिग है.                            आज की स्थिति में मोदी विरोधी विपक्ष ने ही पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया है. एक तरफ देश का मुस्लिम समुदाय विपक्ष के पीछे खड़ा है तो दूसरी तरफ मोदी समर्थक हिंदू वर्ग है. यह स्थिति मोदी के लिए ज्यादा फायदेमंद ही कही जाएगी. जो काम निर्णायक तौर पर भाजपा, आरएसएस और हिंदूवादी संगठन 70 सालों में नहीं कर सके वह काम मोदी विरोधियों ने पिछले एक माह में करके दिखा दिया. वस्तुतः मोदी विरोधी आज ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां से उन्हें समझ नहीं आ रहा कि कहां जाना है.
    विपक्ष के पास ऐसा नहीं था कि मुद्दे नहीं थे जिन पर मोदी को घेरा जा सकता था. लेकिन उन ज्वलंत मुद्दों को तिलांजलि देकर उसने जो रास्ता चुना वह आत्मघाती ही कहा जाएगा. वस्तुतः यह बात विपक्ष आज तक नहीं समझ सका कि मोदी और अमित शाह वाली भाजपा ने जो निर्णय किए हैं वे दल हित में किए गए निर्णय नहीं हैं, वे ऐसे निर्णय हैं जिनकी देश को साठ सालों से प्रतीक्षा थी. ये निर्णय ऐसे हैं जिनसे विपक्ष को किसी भी तरह का लाभ हो ही नहीं सकता. ये निर्णय विगत 6 महीनों की कालावधि में लिए जाना मोदी की मजबूती को ठोस आधार देने वाले हैं. आगे के साढ़े चार  सालों में मोदी निश्चित ही कुछ और कड़े फैसले जैसे जनसंख्या नियंत्रण, समान नागरिक संहिता और पाक अधिकृत कश्मीर में सैन्य कार्रवाई आदि लेंगे तब विपक्ष के पास जनसमर्थन के लाले पड़ जाना तय हैं.
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शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

क्या दुश्मन देश के ‘आतंकियों’ को नागरिकता चाहता है विपक्ष


      क्या दुश्मन देश के ‘आतंकियों’ को नागरिकता चाहता है विपक्ष
                       डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया  
         बीते साल दिसंबर के आखिरी पखवाड़े में देश भर में जो हिंसा, आगजनी लूटपाट और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का काम हुआ वह आज भी जारी है. देश के सरकार विरोधी रवैये का इसे निकृष्टतम और घृणित काम ही कहा जाएगा. नागरिकता संशोधन अधिनियम(सीएए) के विरोध के नाम पर ऐसा नंगा नाच देख कर देश के इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों पर शर्म आती है. जिस कानून का संबंध केवल मुस्लिम देशों के गैरमुस्लिम प्रताड़ितों को नागरिकता देने से है तथा जिसका संबंध भारत के नागरिकों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालता उसे भ्रम का वातावरण बना कर पूरे देश को हिंसा और अराजकता में घसीटने का अपराध किया जा रहा है. जिस कानून बनाने के पीछे सरकार की मंशा पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, ईसाईयों, पारसियों और जैन धर्मावलंबियों जो भारत की शरण में आए दलितों और शोषितों को संबल देना है  उसे सरकार विरोधियों ने धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ करार देकर विवाद खड़ा किया है. सीएए कानून संसद के दोनों सदनों से गंभीर बहस के बाद अस्तित्व में आया है इससे कोई भी विरोधी दल इंकार नहीं कर सकता लेकिन क्योंकि इस कानून में शरणार्थियों को नागरिकता देने में मुसलमानों का जिक्र नहीं है इसलिए इसे पूरे विपक्ष ने एक मुद्दा बनाकर देश को अराजकता में झोंक दिया.
     सीएए के नाम पर पूरे देश में भ्रम फैलाया गया कि यह कानून मुस्लिम विरोधी है जबकि यह कानून स्पष्ट करता है कि तीन  देशों के प्रताड़ित गैर मुसलमान लोगों को भारत की नागरिकता का प्रावधान इसलिए किया गया क्योंकि यह तीनों देश इस्लामिक है और यहां मुसलमानों के बीच गैर मुस्लिम भारतीयों के साथ अन्याय, शोषण, बलात्कार, हत्या और प्रताड़ना होती है और इन प्रताड़ितों के लिए दुनिया का कोई अन्य देश शरण नहीं देता. तब भारत ही केवल ऐसा देश है जो उनकी सुरक्षा कर सकता है. इतनी स्पष्टता के बावजूद भी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी सरकार विरोधी राजनीतिक दलों, मुस्लिम संगठनों के मौलवियों, भारत तेरे टुकड़े होंगे कहने वाली गेंग  और अराजकता में विश्वास करने वाले असामाजिक तत्वों ने देश को हिंसा की आग में झुलसा दिया.
   प्रचारित यह किया जा रहा है कि यह कानून संविधान के विरुद्ध है जबकि प्रसिद्ध  कानूनविद वकील श्री हरीश साल्वे ने कहा है कि यह कानून भारतीय संविधान की किसी भी धारा का उल्लंघन नहीं करता. अब यह किसी से छिपा नहीं है कि सारे मोदी विरोधी राजनीतिक दल इसे पुरजोर समर्थन कर हवा दे रहे हैं. इन्हें लग रहा है कि मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक पर कानून, कश्मीर से धारा 370 और 35ए  को हटाने जैसे बड़े निर्णय देश की जनता को कठोर निर्णय करने वाली सरकार के रूप में मोदी को प्रसिद्धि दिला रहे हैं. यही नहीं मोदी के इस कार्यकाल में 70 सालों से लंबित राम मंदिर मामला सुलझना भी मोदी सरकार के पक्ष में जाने के कारण सत्ता विरोधी दल हाशिए पर जाते दिख रहे हैं. यही कारण है कि सीएए के नाम पर मुसलमानों को भड़काने का गुरुतर दायित्व ये सत्ता विरोधी अपने कंधों पर ढोने के लिए सहर्ष तैयार हो गए. विभिन्न प्रदेशों को आग और हिंसा की चपेट में लाकर यदि विरोधी दल यह सोच रहे हैं कि वे मोदी की लोकप्रियता और उनके राजनीतिक कद को छोटा कर देंगे तो वे बड़ी गलतफहमी पाल बैठे हैं. वस्तुतः मोदी विरोधी दल और नेता जिन लोगों के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं उनके पैरों के नीचे की जमीन एकदम खोखली है. विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार धार्मिक ध्रुवीकरण कर रही है. लेकिन अगर गहराई से विचार किया जाए तो धार्मिक ध्रुवीकरण का काम तो हाल के दिनों में विरोधी दलों ने ही किया है. देश को हिंदू मुसलमान में बाँटकर विरोधी दलों ने मोदी सरकार की मदद ही की है. आज की स्थिति में देखा जाए तो सारे विरोधी दल उन मुस्लिमों के लिए लड़ रहे हैं जो धर्म आधारित तीन  देशों के मुस्लिम नागरिक हैं या मुस्लिम घुसपैठिए हैं. बार-बार संविधान की दुहाई देकर यह कहना कि मोदी सरकार ने मुसलमानों को इस कानून में शामिल ना कर देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का अतिक्रमण किया है पूरी तरह से बकवास है क्योंकि इस कानून का स्पष्ट मानना है कि इन तीनों देशों में मुसलमान प्रताड़ित नहीं होते बल्कि अल्पसंख्यक नागरिक ही प्रताड़ित होते हैं तब विदेशी मुसलमानों को नागरिकता दिए जाने का सवाल कहां खड़ा होता है. यही नहीं देश के नागरिकों के मन में यह विश्वास भी दृढ़ता से घर कर रहा है कि विरोधी दल प्रायः पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का परोक्ष रूप से समर्थन करते हैं. पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार ने जितने भी दृढ़ कदम उठाए उन सबके लिए विरोधी दलों ने प्रमाण मांगे. सर्जिकल स्ट्राइक हो या कश्मीर में पत्थरबाजों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई या ऑपरेशन ऑल आउट उन सब का विरोध आडम्बरों के साथ किसी ना किसी रूप में मोदी विरोधी राजनीतिक दलों ने किया जिससे भारत के बहुसंख्यकों, के मन में इन राजनीतिक दलों के प्रति नाराजगी ही ज्यादा दिखी इसीलिए लोग सवाल उठा रहे हैं कि भारत के विरोधी दल कहीं गैर हिंदुओं को नागरिकता देने का समर्थन कर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के कट्टरपंथी आतंकियों को तो देश में नहीं बसाना चाहते. अपने वोट बैंक की खातिर विरोधी राजनीतिक दल  बंगलादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुसलमानों का समर्थन कर देश के एक बड़े वर्ग का बचा खुचा समर्थन भी खोते जा रहे हैं. यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार जिस दृढ़ता से अपने निर्णय लागू कर रही है वह लोगों को पसंद आ रहा है. हालांकि विगत समय में भाजपा को पांच राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं लगाया जा सकता कि मोदी सरकार के राष्ट्र हित में उठाए गए कदमों के विरुद्ध लोगों ने जनादेश दिया है. विरोधी दलों को समझना होगा कि केंद्रीय राजनीति और प्रादेशिक राजनीति दोनों में बड़ा अंतर है. प्रादेशिक स्तर पर क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति और स्थानीय मुद्दे सरकारों के गठन में महत्वपूर्ण होते हैं जबकि राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे पर्याप्त भिन्न होते हैं इसलिए विरोधी दल यदि यह सोचते हैं कि प्रदेशों में जोड़-तोड़ से सत्ता में आने से वे केंद्रीय सत्ता में बड़ा उलटफेर कर सकेंगे दिवास्वप्न ही कहा जाएगा. आश्चर्य तो इस बात का है कि इन प्रदर्शनों और हंगामे के बाद विपक्षी दल चाहते हैं कि सरकार अपना फैसला बदल दे लेकिन वह यह नहीं देख पा रहे कि आज पूरे देश में सीएए के समर्थन में लोग घरों से निकलने लगे हैं और ऐसे में निश्चित ही सरकार इस कदम से पीछे नहीं हटेगी.