शनिवार, 14 मार्च 2020

दिल्ली हिंसा के दोषी जो भी होंगे वे पकड़ में जरूर आएँगे


         दिल्ली हिंसा के दोषी जो भी होंगे वे पकड़ में जरूर आएँगे  
                     डॉ. रिकृष्ण बड़ोदिया

   यह सही है कि सरकार के विरुद्ध धरना प्रदर्शन किसी भी संगठन का लोकतांत्रिक अधिकार है और यह वैधानिक है लेकिन क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि प्रदर्शन एक सीमा तक ऐसा हो कि उसे दूसरों के अधिकारों का हनन ना हो और अगर हो भी तो उसकी कोई समय सीमा भी तो हो। 85 से अधिक  दिनों से शाहीन बाग के धरने पर बैठे लोग आम जनजीवन के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं लेकिन प्रदर्शनकारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा। निर्दोष नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है और वह भी भ्रम फैलाकर कि सीएए का कानून देश के अल्पसंख्यकों की नागरिकता छीन लेगा दसियों दफा जब मोदी और अमितशाह सहित सरकार के मंत्रियों ने स्पष्ट कर दिया कि यह क़ानून किसी की नागरिकता छीनने वाला नहीं बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित लोगों को नागरिकता देने वाला है तो भी विरोध प्रदर्शन जारी रखना षड्यंत्रपूर्ण नहीं तो क्या है जिस कांग्रेस पार्टी ने इसे पुरजोर समर्थन किया उसी के राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल को राज्यसभा में कहना ही पड़ा कि यह क़ानून किसी की नागरिकता नहीं छीनेगा  
  यह एक स्थापित तथ्य है कि देश का मुस्लिम तबका हद से ज्यादा उग्र और असहिष्णु है। बात बात पर पाकिस्तान जिंदाबाद, छीन के लेंगे आजादी, जिन्ना वाली आजादी, भारत तेरे टुकड़े होंगे- इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह, तेरा मेरा रिश्ता क्या - ला इलाहा इल्लल्लाह जैसे नारे इस बात की पुष्टि करते हैं कि संविधान कि रक्षा के नाम पर मजहबी कार्ड खेला गया दिल्ली की हिंसा इस बात का प्रमाण हैं कि इस धरने में दिखावा शांति पूर्ण था लेकिन उसमें अंदर ही अन्दर आग सुलगाई जा  रही थी जिसकी परिणिति 24 फरवरी को दोपहर 12 बजे से 25 फरवरी रात 11 बजे तक चली दिल्ली हिंसा के रूप में हुई, जिसमें 52 लोगों की मौत हुई, 526लोग घायल हुए ,371 दुकानें जलाई गईं और 142  घरों में आग लगा दी गई
  भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है और उसमें सभी नागरिकों को अपने अपने धर्म को मानने की न केवल स्वतंत्रता है बल्कि उनका यह मौलिक अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि आप अपने इस अधिकार का उपयोग करते हुए देश की अस्मिता, एकता और अखंडता को ताक पर रख दें। शाहीन बाग का प्रदर्शन सोची-समझी रणनीति के तहत महिलाओं को आगे रखकर किया गया जिसको न केवल मुस्लिम नेताओं , मुल्ला-मौलवियों ने बल्कि मोदी विरोधी दलों ने पुरजोर समर्थन दिया कहा गया कि यह आन्दोलन महिलाओं ने स्वत: स्फूर्त होकर किया लेकिन इसके पीछे की रणनीति यही थी कि सरकार महिलाओं के विरुद्ध कोई कठोर कदम नहीं उठा पाएगी और अगर वह कोई कठोर कदम उठाएगी तो उसे कठघरे में खड़ा करने में बड़ी आसानी होगी.
 निसंदेह धरने के इन 85 दिनों में प्रदर्शन के दौरान अधिक से भड़काऊ बयान भी दिए गए। किसी ने प्रधानमंत्री मोदी को जालिम बताया तो किसी ने देश के टुकड़े करने के लिए मुसलमानों को कमर कसने के लिए भड़काया, किसी ने सड़कों पर उतरने का आह्वान किया तो किसी ने कहा जो कायर होते हैं वे घर पर बैठे रहते हैं । कुल मिलाकर बाहर से शांत दिखाई देने वाला यह धरना प्रदर्शन बहुत कटुता और असहिष्णुता से भरा हुआ है। यह इससे स्पष्ट हो जाता है कि बंगलुरु के फ्रीडम पार्क में एआईएमआईएम की सीएए के विरोध में असदुद्दीन ओवैसी की जनसभा में ओवैसी की तकरीर के तुरंत बाद एक बालिका अमूल्या लियोना ने  पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। कोई माने या ना माने लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक नाबालिग बालिका बिना किसी की हरी झंडी के ऐसा कर सकती है। अमूल्या ने एक टीवी इंटरव्यू में खुद स्वीकार किया कि भारत विरोधी कार्यों के लिए एक पूरी की पूरी लॉबी सक्रिय है और जो भी कुछ गलत किया जाता है उसके पीछे पूरा का पूरा संगठन सक्रिय होता है। भले ही असदुद्दीन ओवैसी ने मंच से लड़की के कृत्य की मजम्मत की हो लेकिन यह तो तय है कि सब में उनकी मौन स्वीकृति जरूर रही होगी, क्योंकि भड़काऊ बयान और कंट्रोवर्सी स्थापित करने में उनसे बड़ा मुस्लिम नेता कोई नहीं है। एआईएमआईएम के जितने भी नेता और प्रवक्ता हैं वह सब आज देश की एकता और अखंडता को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
   इसी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और मुंबई के भायखला के पूर्व विधायक वारिस पठान ने कर्नाटक के गुलबर्गा में सीए के विरोध में आयोजित एक जनसभा में कहा अब हमें इकट्ठा होकर चलना पड़ेगा, आजादी लेनी पड़ेगी,  और जो चीज मांगने से नहीं मिलती उसे छीनना पड़ता है, अब वक्त आ गया है। कहा जा रहा है कि शाहीन बाग में मां बहनों को भेज दिया, अरे भाई अभी तो सिर्फ शेरनीयां बाहर निकली हैं और तुम्हारे पसीने छूट गए और समझ लो हम लोग साथ में आ गए तो क्या होगा। हम 15 करोड हैं लेकिन याद रखना 100 (करोड़) पर भारी हैं
   खुद असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन भी घृणा फैलाने वालों में अब्बलों में अव्वल हैं एक जनसभा में उन्होंने मुस्लिम युवकों को भड़काते हुए कहा था कि ‘मुस्लिम युवकों को शेर बनना होगा जिससे कोई चायवाला उनके सामने आकर खड़ा ना हो पाए2013 में अपने एक बयान में अकबरुद्दीन ने भड़काऊ बयान देते हुए कहा था कि हम पच्चीस करोड़ हैं और तुम 100 करोड़, 15 मिनट पुलिस हटाओ, देख लेंगे किसमें कितना दम है। हैदराबाद की एक जनसभा में इन्हीं ओवैसी ने सीए का विरोध करते हुए मुस्लिमों को भड़काने के लिए कहा कि किसी को डरने की जरूरत नहीं। (पता नहीं कौन डरा रहा है खुद ही डरो तो इसका इलाज मोदी के पास तो क्या हकीम लुकमान के पास भी नहीं।) जो लोग पूछ रहे हैं कि मुसलमान के पास क्या है, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि तू मेरे कागज देखना चाहता है,  मैंने 800 साल तक इस मुल्क में हुक्मरानी और जांबाजी की है, यह मुल्क मेरा था, मेरा है और मेरा रहेगा। मेरे अब्बा और दादा ने इस मुल्क को चारमीनार दिया, कुतुबमीनार दिया, जामा मस्जिद दिया, हिंदुस्तान का पीएम जिस लाल किले पर झंडा फहराता है उसे भी हमारे पुरखों ने दिया।
   इसी तरह कुछ समय पहले न्होंने कहा था यह देश प्रधानमंत्री मोदी के बाप का नहीं है, आज देश के सेकुलर लोग कहां हैं, अखलाक को मारा गया, जुनैद को मारा गया, क्या मुसलमान होना गुनाह है। अरे विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस वालों प्रधानमंत्री मोदी सुन लो, हिंदुस्तान तुम्हारे बाप का नहीं। कुल मिलाकर मुसलमानों को भड़काने का निरंतर प्रयत्न किया जाता रहा।
   जिस सीएए और एनपीआर की शुरुआत यूपीए के शासनकाल में हुई वह आज मोदी विरोधियों की आंखों की किरकिरी बना हुआ है। जितने भी मुस्लिम धर्मगुरु, मौलवी और इमाम हैं उन्होंने अपनी अपनी तरह से अपने अपने क्षेत्रों में भड़काऊ बयान देकर देश की फिजा को बिगाड़ने का काम किया। कहा जा रहा है हम कागज नहीं बताएंगे लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि अभी एनआरसी आया नहीं और डर का आलम यह है कि चोर की दाढ़ी में तिनका। क्या मुस्लिम धर्म गुरुओं का यह कर्तव्य नहीं बनता कि अपनी कौम को समझाएं कि जिन परिवारों की पीढ़ियां यहां गुजर गईं  उनकी नागरिकता कैसे और क्यों कर छिन  जाएगी। और दूसरी तरफ आप डर रहे हैं! अव्वल तो एनआरसी की कोई सूरत अभी है नहीं और हो भी तो क्या आप अपने हिंदुस्तानी होने का कोई प्रमाण भी नहीं दे सकते। अपनी कौम को बरगलाने का काम करना कहां तक उचित है। एक तरफ तुम कहते हो हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं और दूसरी तरफ अपने बाप के बारे में भी नहीं बताना चाहते।
    आज के हालातों में सीएए, एनपीआर और एनआरसी विरोधी इस बात को समझने को तैयार नहीं हैं कि यह कानून किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं बना। बार-बार प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और सरकार के अन्य प्रवक्ताओं ने बताया है कि सीए का संबंध किसी की नागरिकता नहीं छीनेगा किंतु जानबूझकर इसे तूल देते हुए देश में अराजकता की स्थिति पैदा करना विरोधियों के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
   धरना प्रदर्शन की हठधर्मिता पर विचार रखते हुए केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में छात्र परिषद को संबोधित करते हुए सही ही कहा था कि सड़कों पर बैठे हैं, अपने विचार थोपने के लिए आम जनजीवन को बाधित कर रहे हैं जो कि आतंकवाद का एक रूप है। उग्रता केवल हिंसा के रूप में सामने नहीं आती यह कई रूपों में सामने आती है। अगर आप मेरी बात नहीं सुनेंगे तो मैं आम जनजीवन को प्रभावित कर दूंगा असहमति  लोकतंत्र का सार है, इससे कोई परेशानी नहीं लेकिन 5 लोग विज्ञान भवन के बाहर बैठ जाएं और कहें हमें यहां से तब तक ना हटाया जाए जब तक छात्र संसद एक प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर लेती जिसे हम स्वीकार नहीं कर लेते, यह आतंकवाद का एक रूप है। निसंदेह यह बयान मुस्लिम तबके को अच्छा नहीं लगा होगा लेकिन सच्चाई तो यही है की शाहीन बाग का धरना प्रदर्शन किसी आतंकवाद से कम नहीं रहा
दिल्ली हिंसा के बाद मुस्लिम नेताओं और विपक्ष ने भाजपा के नेताओं पर भड़काऊ ब्यान देने का राग अलापना शुरू कर दिया है वे कपिल मिश्रा , अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा को इसके लिए दोषी ठहराकर अपने पक्ष के लोगों को पाक साफ़ बताने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के बयान चुनावी रेलियों में वोट पाने के लिए दिए गए बयान थे जबकि कपिल मिश्रा  का बयान हिंसा भड़काने के लिए नहीं बल्कि शाहीन बाग़ की तरह चांद बाग़ और जाफराबाद में शाहीन बाग़ की तर्ज पर खड़े हो रहे धरने प्रदर्शन को रोकने के लिए थे जिसका उद्देश्य आम जनजीवन को परेशानियों से बचाना था विपक्ष और मुस्लिम नेता और प्रवक्ता इन नेताओं को तो कठघरे में खड़ा करते हैं किन्तु आप विधायक शोएब इकबाल, आप पार्षद ताहिर हुसैन, पिस्तौल लहराने वाले शाहरुख़, आप विधायक अमानतुल्लाह और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के हत्यारे सलमान का नाम आते ही मुंह में दही जम जाता है लेकिन दोषी जो भी हों वे पकड़ में जरूर आएँगे इसमें कोई शक किसी को नहीं होना चाहिए

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

सीएए तो बहाना है असली पीड़ा कुछ और है...


            सीएतो बहाना है असली पीड़ा कुछ और है...

                        डॉ.रिकृष्ण बड़ोदिया
       सीएए अर्थात नागरिकता संशोधन कानून 12 दिसंबर 2019 को बना उसके बाद पूरे देश में मुस्लिम तबके में जैसे भूचाल आ गया. जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जेएनयू से निकलकर सरकार विरोधी छात्र सड़कों पर आ गए. देश की राजधानी में आगजनी हिंसा पथराव और प्रदर्शनों का दौर जारी हुआ. इस सबके बावजूद कि नागरिकता संशोधन कानून भारत के किसी भी नागरिक की नागरिकता को प्रभावित नहीं करता, मुस्लिम समुदाय ने इसे मुस्लिम विरोधी करार दिया और सड़कों पर उतर आए. देश के सरकार विरोधी विपक्ष ने मुस्लिम तुष्टिकरण और आम चुनावों में अपनी करारी हार की भड़ास निकालने का इसे सबसे माकूल मौका समझकर सीएए के विरुद्ध प्रदर्शनों को समर्थन देना शुरू कर दिया. कांग्रेस, वामपंथी दलों के साथ मुस्लिम संगठन सक्रिय हो गए. ऐसे में ही 15 दिसंबर को शाहीन बाग में मुस्लिम महिलाओं का धरना प्रदर्शन शुरू हुआ जो आज भी जारी है.
   शाहीन बाग का प्रदर्शन इस मामले में विलक्षण है कि पुरुष प्रधान मुस्लिम समाज ने अपने घर की दादियों, बच्चों और महिलाओं को आगे कर यह सिद्ध कर दिया कि वह अपने वेबुनियादी लक्ष्य को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. शायद यह दूसरा मौका है जब शाहबानो के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध मुस्लिम समुदाय ने देशभर में प्रदर्शन किया था. मुस्लिम समुदाय का मुस्लिम महिला शक्ति का ऐसा इस्तेमाल शायद इतिहास में पहली बार ही सामने आया है. वैसे भारतीय संस्कृति और सभ्यता में महिलाओं को ढाल बनाकर लड़ाई लड़ना शेरदिली तो नहीं कही जा सकती है लेकिन सीएए के विरोध के लिए मुस्लिम समुदाय की यह रणनीति राजनीति की सोची समझी साजिश है
  . शाहीन बाग के धरने ने आसपास के क्षेत्र के लाखों आम नागरिकों की जिंदगी को बंधक बना दिया. शाहीन बाग के धरने ने कालिंदी कुंज, उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के फरीदाबाद आने जाने वाले करीब 20 लाख लोगों को सड़क रोककर प्रभावित किया है. मुस्लिम धरना प्रदर्शन करने वाली महिलाओं का कहना है कि जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाता वह शाहीन बाग नहीं छोड़ेंगी. धरना स्थल के आसपास के  लगभग 100 शोरूम मालिकों को अब तक कई करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है, वे परेशान हैं. दैनिक जागरण की खबर के अनुसार कई कारोबारियों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें बहुत नुकसान हुआ है लेकिन वे प्रदर्शन का विरोध नहीं कर सकते. अगर वे अपनी बात प्रदर्शनकारियों के सामने रखते भी हैं तो उन्हें कौम का गद्दार कहा जाता है. ऐसे में नुकसान बर्दाश्त करना ही उनके पास एकमात्र विकल्प है. क्योंकि कारोबारियों को उन्हीं के बीच रहना है.’
      17 फरवरी को शाहीन बाग से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए लगी याचिकाओं के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह यही था कि प्रदर्शनकारियों का यह अधिकार है कि वह विरोध करें लेकिन यह नहीं हो सकता प्रदर्शनकारी सड़क रोक कर दूसरे लोगों को उनके अधिकार से वंचित करें. यदि सभी लोग धरना प्रदर्शन के नाम पर सड़क जाम कर दें तो क्या होगा. इस टिप्पणी के बाद धरने पर बैठी एक बुजुर्ग मुस्लिम दादी ने प्रेस से बात करते हुए कहा कि जब तक उनकी बात सरकार नहीं मानती, जब तक सीएए, एनपीआर और एनआरसी वापस नहीं लिया जाता हम कोर्ट की भी नहीं मानेंगे. ये दादियां इस सब के पीछे का खेल नहीं समझती उनसे जैसा कहलवाया जाता है वह कह देती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने समस्या के हल के लिए तीन वरिष्ठ वकीलों को मध्यस्था के लिए निर्देश देते हुए 24 फरवरी को पुनः सुनवाई की तारीख तय की है किंतु नहीं लगता कि इस बीच कोई समाधन हो पाएगा.
    वस्तुतः जो स्थिति दिखाई दे रही है वह यही है कि धरने पर बैठी दादियां, नानियाँ, बच्चे और महिलाएं वहां से नहीं हटेंगे. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित सरकार के प्रतिनिधि और प्रवक्ता अपनी जनसभाओं में और  टीवी डिबेट्स में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि इस कानून का देश के नागरिकों से कोई संबंध नहीं और देश के नागरिकों की नागरिकता भी प्रभावित नहीं हो रही है और यह भी कि यह कानून किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा फिर सरकार क्या बात करे. सच्चाई तो यह है यह धरना प्रदर्शन मुस्लिम महिलाओं को ढाल बनाकर मुस्लिम संगठन, कांग्रेस, वामपंथी और ऑल इंडिया मजलिस-- इत्तेहादुल मुस्लिमीन अर्थात ओवैसी की पार्टी और मोदी विरोधी करा रहे हैं और सीएतो बहाना है,असली पीड़ा कुछ और है.
   यह मोदी सरकार के पिछले छह-सात महीने में किए गए महत्वपूर्ण फैसलों- कश्मीर से धारा 370 और 35 को हटाना, इंस्टेंट तीन तलाक पर रोक का कानून  और राम मंदिर मुद्दे पर मुसलमानों की सुप्रीम कोर्ट में हार की भड़ास है. विरोधी दल इस बात से गंभीर रूप से परेशान हैं कि ये कठोर और शक्तिशाली निर्णय आम जनमानस में मोदी सरकार की दृढ़ता को और ज्यादा मजबूत करते जा रहे हैं. कांग्रेस इस बात से परेशान है कि मोदी सरकार एक-एक कर ऐसे निर्णय ले रही है जिन्हें उसने साठ सालों के अपने शासनकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए उपयोग किया. अगर हम कश्मीर से धारा 370 और 35 हटाने की बात करें तो भारत के इतिहास में यह निर्णय देश की एकता और अखंडता और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग होने की पुष्टि का निर्णय है. सच्चाई तो यह है कि इस निर्णय ने जम्मू कश्मीर का राजनीतिक हुलिया ही बदल कर रख दिया. जिस कश्मीर पर कुछ पुश्तैनी सियासतदानों का राज था और जो वहां के बेताज बादशाह थे, अब ना तो उनकी बादशाह रही और ना ही कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा ही रहा. आज जम्मू कश्मीर 1947 के बाद विशुद्ध रूप से भारत का एक केंद्र शासित राज्य बना. इन धाराओं को हटाने के साथ मोदी ने जो सबसे बड़ा काम किया वह यह है कि उन्होंने जम्मू कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया. इससे सरकार ने लद्दाख वासियों को कश्मीरी सियासतदानों के शोषण से मुक्त कराने में सफलता पाई. जिस जम्मू कश्मीर में देश का तिरंगा नहीं लहराया जा सकता था वहां आज न केवल भारत का तिरंगा लहरा रहा है बल्कि लेफ्टिनेंट जनरल की नियुक्ति कर शासन व्यवस्था केंद्र के अधीन हो गई. ऐसी स्थिति में मोदी विरोधी मुंह ताकते रह गए तब क्यों कर मोदी का विरोध ना हो. सच्चाई तो यह है कि यह सारे निर्णय जहां एक और देश की अस्मिता से जुड़े थे वहीं इनसे देश की मुस्लिम कम्युनिटी का गहरा संबंध था. चाहे वह राम मंदिर का मुद्दा हो, तीन तलाक या 370 - 35a का ये सब देश की मुस्लिम कम्युनिटी को प्रभावित करते हैं. इन निर्णयों की उद्घोषणा पर मोदी विरोधियों को चीखने चिल्लाने का मौका नहीं मिल पाया हालांकि विपक्ष ने संसद में इनका पुरजोर विरोध किया.  लेकिन यदि विपक्ष सड़कों पर हाय तोबा करता तो यह राष्ट्र के विरुद्ध कार्य माना जाता. शाहीन बाग धरने से सीएए कानून खत्म करवाने का तो बहाना है वस्तुतः यह राष्ट्रहित में संशोधित या बने कानूनों की पीड़ा है जिसने इन सब विरोधियों को एकजुट करने का काम किया. शाहीन बाग की फंडिंग का कनेक्शन जब पीएफआई से होता है, जब शाहीन बाग समर्थक सरजील इमाम देश से असम को (चिकन नेक) अलग कर देने का बयान देता है तब लगता है कि मुस्लिम दादियां, बच्चे और मोहतरमाएं इस बात से पूरी तरह बेखबर हैं कि इसके पीछे का सच भारत को तोड़ने की साजिश का है. ये महिलाएं और बच्चे अल्लाह की ऐसी गाय हैं जिन्हें देश विरोधी और स्वार्थी तत्वों ने शाहीन बाग़ के खूंटे से बांध दिया है. 65 दिन में अपने ही समुदाय के कारोबारियों का व्यापार ठप्प करना और आम जनजीवन को सड़क बंद कर बंधक बनाना विरोध प्रदर्शन के अधिकार का बेजा इस्तेमाल नहीं तो क्या है. सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों से सही सवाल किया कि यदि इसी तरह का प्रदर्शन सभी सड़कों को बंद कर दे तो क्या होगा. शाहीन बाग देश में अधिकांश लोगों द्वारा पसंद भले ही नहीं किया जा रहा किंतु पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को बहुत पसंद आ रहा है. कट्टरपंथी मुसलमान चाह रहे हैं सरकार किसी भी दशा में उनके सामने झुक जाए किन्तु ऐसा होना संभव नहीं. वस्तुतः शाहीन बाग दिल्ली के चुनावों के लिए रचा गया एक प्रपंच था जिसका उद्देश्य भाजपा को दिल्ली में हराना था और उसमें मोदी विरोधी सफल भी हो गए. लेकिन अब यह धरना ऐसे मुकाम पर पहुँच गया है जहां से मुस्लिम समुदाय सम्मानजनक वापसी चाहता है. किन्तु ऐसा लगता नहीं कि सरकार अपने कदम वापिस लेगी और उसे लेना भी नहीं चाहिए. देखना होगा कि शाहीन बाग़ धरने का अंत सुप्रीम कोर्ट के कठोर निर्णय से होगा या अभी और चलेगा.

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

‘सबका’ विश्वास कभी नहीं मिलेगा भाजपा को


                    ‘सबका’ विश्वास कभी नहीं मिलेगा भाजपा को

  -डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया  
      जिस दिल्ली की जनता ने देश के आम चुनावों में सभी 7 सीटों का भाजपा को उपहार दिया उसी दिल्ली की जनता ने विधानसभा चुनावों में भाजपा को नकार दिया. भाजपा की इस हार ने निसंदेह कई सवाल खड़े कर दिए हैं. भाजपा ने मोदी कार्यकाल में देश हित में ऐसे महत्वपूर्ण फैसले बड़ी कठोरता से किए जिनके होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. चाहे  तीन तलाक का मुद्दा हो या धारा 370 और 35a का, चाहे राम मंदिर का विवाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुलझना हो या नागरिक संशोधन कानून हो इन सबको आत्मविश्वास और कठोरता से लागू करना दिवास्वप्न से कम नहीं था. अगर सर्वेक्षण कराया जाए तो एक विशेष तबके को छोड़कर आम जनता इसके पक्ष में ही खड़ी मिलेगी. स्वाभाविक था ऐसी कंफर्टेबल स्थिति में भाजपा की दिल्ली में सरकार बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अरविंद केजरीवाल दोबारा दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए. अगर गंभीरता से विचार करें तो यह कहा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल की यह जीत 2015 से भी बड़ी जीत है. 2015 में ‘आप’ ने 67 सीटें जीतकर इतिहास रचा था लेकिन इस बार की 62 सीटें 67 सीटों से भी भारी जीत इसलिए कही जा सकती है क्योंकि सारी केंद्रीय सरकार की राष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद उसने मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा को पटखनी दी है.
   भाजपा यह संतोष भले ही कर ले कि उसके वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई लेकिन सरकार बनाने की सारी ख्वाहिशें तो धरी की धरी रह गईं. मतलब साफ है कि दिल्ली की जनता ने राज्य में भाजपा या मोदी-अमित शाह को स्वीकार नहीं किया. देश के आम चुनावों के बाद लगातार प्रदेश में भाजपा सरकारों का हाथ से फिसलना कोई साधारण बात नहीं है. पहले छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाथ से फिसल गया तो 2020 आते-आते महाराष्ट्र और झारखंड हाथ से निकल गया. तो क्या यह माना जाए कि मोदी मैजिक ढलान पर है. लेकिन ऐसा नहीं माना जा सकता क्योंकि राज्य और केंद्र के मुद्दे कभी समान नहीं होते. जो राष्ट्रीय मुद्दे होते हैं वे राज्य के मुद्दों से पर्याप्त भिन्न होते हैं. यही कारण है कि राज्यों में जनता ने भाजपा को उतना समर्थन नहीं दिया जितना कि सरकार बनाने के लिए जरूरी होता है और यह स्थिति आगे भी दिखाई दे तो अचंभा नहीं होगा. केंद्र में जनता ने मोदी को और राज्यों में जनता ने विपक्षियों को मौका दिया . वैसे मोदी का जादू आज भी बरकरार है और यह स्थिति 2024 में दिखाई देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जिस राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय मुद्दों को हल कर रही है उससे उसका जनाधार केंद्र के लिए बढ़ता जा रहा है.
   बात अगर दिल्ली की करें तो साफ दिखाई देता है कि दिल्ली की जनता ने स्थानीय मुद्दों को महत्व दिया. निसंदेह अरविंद केजरीवाल ने यह चुनाव अपनी रणनीतिक कुशलता से जीता है. कौन नहीं जानता कि आप की सरकार ने दिल्ली की जनता से जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हुए हैं फिर भी जनता ने उनमें विश्वास जताया है. अरविंद केजरीवाल ने चुनाव के ठीक 3 महीने पहले से अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया था चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सब में अरविंद केजरीवाल ने ताबड़तोड़ प्रचार किया. चुनाव के 6 महीने पहले से स्वयं को जनता में स्थापित करने के लिए डेंगू की रोकथाम वाला प्रचार विज्ञापन चलाया गया. घर-घर में यह संदेश देने में कामयाबी पाई कि केजरीवाल सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी की व्यवस्था पर अतिरिक्त कार्य कर दिल्लीवासियों की समस्या हल की है. वस्तुतः दिल्ली एक बड़ा क्षेत्र है और आम लोगों की जिंदगी भी चक्रीय है. लोगों को विज्ञापनों की विश्वसनीयता जांचने का इतना समय नहीं कि जाकर देखें कि सच्चाई क्या है. जो विज्ञापनों ने दिखाया उस पर विश्वास किया गया फिर आम जिंदगी के लिए आवश्यक वस्तुओं के लिए मुफ्त सुविधाएं (भले ही वे पर्याप्त ना हों) आखिर उनको मिलीं. चुनाव से एन पहले महिलाओं की डी टी सी बसों में यात्रा मुफ्त  करने का दांव भी निशाने पर बैठा. कुल मिलाकर चुनाव जीतने की जितनी अच्छी रणनीति केजरीवाल ने बनाई वह सफलता का कारण बनी.
   ऐसी स्थिति में जब दिल्ली में शाहीन बाग पर मुस्लिम महिलाओं का सीएए के विरोध में प्रदर्शन चल रहा हो ऐसे में केजरीवाल ने प्रत्यक्ष रूप से उससे दूरी बनाए रखी. केजरीवाल ने अपनी आलोचना का मौका अपने विपक्षियों को नहीं दिया. वहीं  उनके सिपहसालारों जिनमें अमानतुल्लाह का नाम सर्वोपरि है ने मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण करने का काम किया. स्वाभाविक है कि केजरीवाल ने अपने नुमाइंदों से ही सीएए का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन कराया किंतु स्वयं निरपेक्ष बने रहे. वहीं दूसरी ओर भाजपा का यह अनुमान कि उसने विगत 6 महीनों में जो अकल्पनीय निर्णय लिए हैं वह दिल्ली में सरकार बनाने में मदद करेंगे संभव नहीं हो सका. भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दों को प्रचारित कर चुनाव जीतने की  कोशिश की किंतु संभव नहीं हो सका. कहने को कहा जा सकता है कि भाजपा के नेताओं जिनमें प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर का नाम शामिल है ने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए बयान दिए लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा के हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के विपरीत मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण एक मुस्त हुआ.  तो साथ ही भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे को भुनाने में असफल रही.
   एक महत्वपूर्ण बात जो  दिखाई देती है वह यह है कि दिल्ली के इन चुनावों में कांग्रेस ने परोक्ष रूप से भाजपा को पटखनी देने के लिए अरविंद केजरीवाल का साथ दिया. भले ही कांग्रेस ने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन किसी भी विधानसभा सीट में उसने गंभीरता से चुनाव नहीं लड़ा. यह इस बात से स्पष्ट होता है कि लगभग 60 से अधिक विधानसभा सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जप्त हुई है. यही नहीं कांग्रेस ने अंतिम क्षणों में अपने प्रतिबद्ध वोटरों से भाजपा के विरुद्ध ‘आप’ पार्टी के पक्ष में वोट डलवाए.  कांग्रेस ने कुल मिलाकर आत्मघाती कदम ही उठाया जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का वोट भी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को मिल गया.
   वस्तुतःकांग्रेस का मंतव्य स्पष्ट हो गया कि उसे स्वयं की जीत हार की चिंता से अधिक इस बात की चिंता थी कि कहीं भाजपा ना जीत जाए, जिसके लिए उसने अपना जनाधार खोने की भी परवाह भी नहीं की. कांग्रेस के नेताओं के बयानों ने भी स्पष्ट किया कि उसका सरोकार जीतने से ज्यादा मोदी को बदनाम करने का अधिक था. शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों के समर्थन में हमेशा की तरह मणिशंकर अय्यर ने मोदी को ‘कातिल’ की संज्ञा दी तो बेरोजगारी पर प्रहार करने के लिए राहुल गांधी ने  अशिष्टता की सीमाएं लांघते हुए कहा कि ‘यह जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 या 8 महीने बाद यह घर से बाहर नहीं निकल पाएगा. हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे कि हिंदुस्तान के युवा को रोजगार दिए बिना यह देश आगे नहीं बढ़ पाएगा.’ ऐसे बयानों से कांग्रेस को ह पहले भी हानि होती रही है और आगे भी होती रहेगी जिसका लाभ आम चुनावों में पहले भी भाजपा को मिला और आगे भी मिलता रहेगा. लेकिन दिल्ली चुनावों में भाजपा को लाभ नहीं मिल पाया, ना तो राष्ट्रवाद का लाभ मिल पाया और ना ही उसके द्वारा देश हित में बनाए गए कानूनों का ही लाभ मिल पाया.
    चुनावों के विधानसभावार विस्तृत परिणामों का आना अभी बाकी है लेकिन जो परिणाम हैं वह यह बताते हैं कि अधिकांश भाजपा प्रत्याशी 1000 से कम या दो हजार वोटों के अंतर से हारे हैं. स्पष्ट है यदि कांग्रेस के प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने के लिए प्रयास करते तो भाजपा बहुत सी सीटों पर जीत दर्ज कर जाती, संभव है सरकार भी बन जाती.
    आज कांग्रेस इस बात से दुखी नहीं है कि उसके लगभग सभी उम्मीदवारों की जमानत जप्त हुई बल्कि इस बात से खुश है कि भाजपा हार गई. इस तरह की नकारात्मक राजनीति का यह पहला इतिहास ही होगा. दिल्ली चुनावों के परिणामों को अलग कर यदि वर्तमान में राजनीतिक दलों की स्थितियों का मूल्यांकन करें तो आज भी भाजपा पूरे देश में सबसे आगे है जबसे सीएए आया है तब से यह बात भी स्पष्ट हो गई कि मोदी जिस ‘सबका’(मुस्लिम तबके का) विश्वास की बात कर रहे हैं वह सब का विश्वास ना तो पहले कभी भाजपा के साथ था और ना आज है, और ना आगे कभी रहेगा. हिंदुत्व की विशेषता है कि यह सभी को उदारता से अपने साथ जोड़ता है किंतु अल्पसंख्यक कट्टरतावाद से आप उम्मीद नहीं कर सकते और करनी भी नहीं चाहिए. जिस ‘सबका’ विश्वास जीतने के लिए भाजपा जतन कर रही है उसका दुष्प्रभाव उसके परंपरागत वोटों पर पड़ रहा है जो इधर-उधर छिटक कर भाजपा को हानि पहुंचाने का काम कर रहा है. भाजपा जैसी थी वैसी ही बनी रहे तो ही वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकती है.
   भाजपा दिल्ली भले ही हार गई हो किंतु दिल्लीवासियों के दिल में बसती है और दिल्ली ही क्या आज देश के आम लोगों के दिलों में बसी है. जरूरत तो इस बात की है कि ऐसे निर्णय आने चाहिए जिसके लिए भाजपा पहचानी जा रही है. कोई माने या ना माने लेकिन तीन तलाक जैसी प्रथा को हटाया जाना समान नागरिक संहिता का एक भाग है और अब यह जरूरी है कि समान नागरिक संहिता के साथ साथ जनसंख्या नियंत्रण जैसे कानून लागू किए जाएं. पूरे देश में एक कानून होना चाहिए जो सब पर लागू हो


शनिवार, 18 जनवरी 2020

विपक्ष ने जो रास्ता चुना है वह आत्मघाती है


                                विपक्ष ने जो रास्ता चुना है वह आत्मघाती है

                                 डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
                अब यह किसी से छिपा नहीं है कि विपक्ष के सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मन केवल और केवल मोदी और अमित शाह हैं. यह भी एक सच्चाई है कि विपक्ष हताश है और इस हताशा में वह ऐसे निर्णय और कदम उठा रहा है जिससे उसका भला कम और नुकसान अधिक हो रहा है. पिछले साल दिसंबर में जब संसद के दोनों सदनों में नागरिक संशोधन बिल पास होकर कानून बना तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश को आगजनी और हिंसा में झोंक दिया जाएगा. असल में इसके पीछे सबसे बड़ा कारण विपक्ष की हताशा ही है.
     सच्चाई तो यह है कि 2014 में देश में जो सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ और जिसने मोदी को देश की बागडोर सौंप दी तब विपक्ष मन मसोसकर रह गया था. उसे लगा था कि यह बड़ा बदलाव 5 सालों के उसके बनवास के लिए है और मोदी जैसा एक क्षेत्रीय नेता देश को चला पाने में अक्षम सिद्ध होगा और वह  स्वत: ही 2019 में अपदस्थ हो जाएगा. लेकिन मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने ना केवल वापसी की बल्कि ऐसा जनादेश प्राप्त किया कि विपक्ष के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. यही नहीं मई 2019 से जनवरी 2020 तक आते-आते मोदी-2 सरकार ने देश हित में जो ताबड़तोड़ फैसले किए उनसे न केवल विपक्ष बल्कि आम जनता की आंखें भी फटी की फटी रह गईं. तीन तलाक, कश्मीर से धारा 370 और 35 का हटना और राम मंदिर का मुद्दा सुलझना आदि ने विपक्ष को हतप्रभ कर दिया. आज विपक्ष के सामने अपने अस्तित्व का संकट खड़ा है. इन तीन महत्वपूर्ण निर्णय के खिलाफ विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ था क्योंकि ये ऐसे निर्णय थे जिनके पीछे जनकल्याण और देशहित की भावना थी. यदि इनका विरोध किया जाता तो यह स्पष्ट होता कि विपक्ष जनहित और देशहित के विरुद्ध कार्य कर रहा है. ऐसी स्थिति में नागरिक संशोधन अधिनियम में छिद्रान्वेष्ण को आंदोलन का आधार बनाना यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस, लेफ्ट और बाकी मोदी विरोधी विपक्षी दलों को मुस्लिम समुदाय के कंधों पर बंदूक चलाने के अलावा सरकार के विरोध का कोई और कारण नजर नहीं आया.
    भारतीय राजनीति में छात्र आंदोलन बहुत से बदलावों का आधार रहे हैं. फलत: विपक्ष ने जेएनयू, एएमयू और जामियामिलिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी  से सीएए एनपीआर और एनआरसी का जो कृत्रिम भय पैदा किया वह पिछले एक माह से आगजनी और हिंसा और धरना प्रदर्शन का कारण बना जिसमें वामपंथी छात्रों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. लेकिन अब ऐसे आंदोलनों का जनमानस पर विपरीत प्रभाव हो रहा है. विश्विद्यालय के ये छात्र जब ‘जिन्ना वाली आजादी’ मांगते हैं तो राष्ट्रवाद और मजबूत हो रहा है. देश के मानस में मोदी के प्रति और मजबूती के भाव पैदा हुए हैं. यह पूरी तरह स्पष्ट है कि सीएए देश के किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन नहीं करता. किंतु मोदी विरोधियों ने इसका हौवा खड़ा कर देश के मुस्लिम समुदाय को ढाल बनाकर सरकार के विरुद्ध ताना-बाना खड़ा कर दिया. लेकिन मोदी सरकार पिछले 1 माह से चल रहे इस आंदोलन के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी है जो स्पष्ट करता है कि सरकार मजबूती के साथ अपने निर्णय पर अडिग है.                            आज की स्थिति में मोदी विरोधी विपक्ष ने ही पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया है. एक तरफ देश का मुस्लिम समुदाय विपक्ष के पीछे खड़ा है तो दूसरी तरफ मोदी समर्थक हिंदू वर्ग है. यह स्थिति मोदी के लिए ज्यादा फायदेमंद ही कही जाएगी. जो काम निर्णायक तौर पर भाजपा, आरएसएस और हिंदूवादी संगठन 70 सालों में नहीं कर सके वह काम मोदी विरोधियों ने पिछले एक माह में करके दिखा दिया. वस्तुतः मोदी विरोधी आज ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां से उन्हें समझ नहीं आ रहा कि कहां जाना है.
    विपक्ष के पास ऐसा नहीं था कि मुद्दे नहीं थे जिन पर मोदी को घेरा जा सकता था. लेकिन उन ज्वलंत मुद्दों को तिलांजलि देकर उसने जो रास्ता चुना वह आत्मघाती ही कहा जाएगा. वस्तुतः यह बात विपक्ष आज तक नहीं समझ सका कि मोदी और अमित शाह वाली भाजपा ने जो निर्णय किए हैं वे दल हित में किए गए निर्णय नहीं हैं, वे ऐसे निर्णय हैं जिनकी देश को साठ सालों से प्रतीक्षा थी. ये निर्णय ऐसे हैं जिनसे विपक्ष को किसी भी तरह का लाभ हो ही नहीं सकता. ये निर्णय विगत 6 महीनों की कालावधि में लिए जाना मोदी की मजबूती को ठोस आधार देने वाले हैं. आगे के साढ़े चार  सालों में मोदी निश्चित ही कुछ और कड़े फैसले जैसे जनसंख्या नियंत्रण, समान नागरिक संहिता और पाक अधिकृत कश्मीर में सैन्य कार्रवाई आदि लेंगे तब विपक्ष के पास जनसमर्थन के लाले पड़ जाना तय हैं.
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