शुक्रवार, 8 मार्च 2019

राष्ट्रहित से बड़ी कोई विचारधारा नहीं होती


                        राष्ट्रहित से बड़ी कोई विचारधारा नहीं होती

             डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
        बालाकोट आतंकी हमले के बाद देश में लगातार आम जनता में रोष है उस रोष का शमन कुछ हद तक 26 फरवरी को पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक से हुआ. लेकिन इतने भर से देश की जनता इसलिए संतुष्ट नहीं है कि पाकिस्तान को इससे बहुत बड़ी ना तो हानि हुई और ना कोई सबक मिला. पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जहां आतंकियों का दबदबा वहां की सरकार आईएसआई और सेना पर भी लगता है. यदि ऐसा नहीं होता तो कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि वहां अब तक आतंकवाद दम तोड़ चुका होता. वास्तव में आतंक का प्रश्रय दाता पाकिस्तान और आतंकी संगठन एक दूसरे के पूरक हैं. अन्यथा कोई कारण नहीं था कि लादेन, हाफिज सईद, सलाउद्दीन, मसूद अजहर और दाऊद जैसे लोग वहां पनाह पाते या फल फूल रहे होते. सच्चाई तो यह है कि पाकिस्तान को चलाने वालों में वहां की सेना, आईएसआई और आतंकियों का गठजोड़ है. जहां तक सरकार का प्रश्न है तो पाकिस्तान में हमेशा सेना का पपेट ही कुर्सी पर बैठता है. इस स्थिति में तब तक बदलाव नहीं हो सकता जब तक कि यह गठजोड़ न टूटे. इसे तोड़ना अमेरिका या विश्व के अन्य शक्तिशाली देशों के बस की बात भी नहीं लगती. इस गठजोड़ की इतिश्री केवल तब ही संभव है जबकि पाकिस्तान पूरी तरह से नेस्तनाबूद ना हो जाए. लेकिन आज के विश्व में किसी देश के अस्तित्व को पूरी तरह से नष्ट करना भी संभव नहीं है. भारत ने पाकिस्तान से तीन युद्ध लड़ कर बड़े-बड़े झटके दिए लेकिन क्या हुआ सब जानते हैं. पाकिस्तान सिकुड़ गया किंतु उसका पोषित आतंकवाद पसर गया. यह सब इसलिए सच है कि पाकिस्तान खुद नहीं चाहता कि आतंकवाद खत्म हो अन्यथा कोई कारण नहीं था कि संयुक्त राष्ट्र जब हाफिज सईद से पूछताछ करना चाह रहा था तब पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की टीम का वीजा का अनुरोध ठुकराया जाता. यह टीम हाफिज सईद की उस दायर याचिका के सिलसिले में पूछताछ करना चाहती थी जिसमें हाफिज ने संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रतिबंध सूची से अपना नाम हटाने की गुजारिश की थी.
   मान लिया जाए कि आतंकवाद को समूल नष्ट करने के लिए युद्ध जरूरी नहीं है लेकिन यह भी सही है कि युद्ध के बिना आतंकवाद की विभीषिका की तीव्रता को कम भी नहीं किया जा सकता. आज पाकिस्तान के विरुद्ध भारत में जितना सकारात्मक माहौल है ऐसा पहले के दस  सालों में कभी नहीं देखा गया. बालाकोट हमले के बाद लगातार देश के चारो छोरों से आवाज  उठने लगी कि पाकिस्तान के विरुद्ध एक और कड़ा प्रहार किया जाए जो उसके अस्तित्व को खत्म भले ही ना कर पाए परंतु इतना तो कर ही दे कि वह आतंकवाद को नष्ट करने के लिए जरूरी कदम उठाए. यहां यह मानने में कोई संदेह नहीं कि पिछले डेढ़ दशक में पहली बार देश के प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग कर बहुत बड़ी उपलब्धि अर्जित की है. आज विश्व का ऐसा कोई देश नहीं जिसने पाकिस्तान को गरियाया नहीं है. आज वह दाने-दाने को मजबूर है. वह विश्व के कई देशों के सामने मदद के लिए गिड़गिड़ा रहा है किंतु उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह से खत्म हो गई है. किंतु इस सब के बावजूद भी पाकिस्तान अपनी हेकड़ी से बाज नहीं आ रहा तो उसका कारण यही है कि भारत में बैठे कुछ मोदी विरोधी तत्व उसको परोक्ष रूप से ऑक्सीजन देने का काम कर रहे हैं.
 एयर स्ट्राइक के बाद भारत में जहां सभी दलों का सरकार के साथ समन्वय और सहयोग होना था वहां आज पाकिस्तान को देश के मोदी विरोधियों का लाभ मिल रहा है. कांग्रेस सहित बड़ी संख्या में मोदी विरोधी दल (21 पार्टियों की मीटिंग) आज उस एयर स्ट्राइक के सबूत मांग रहे हैं जिस की तारीफ और समर्थन विश्व के कई देश कर रहे हैं.
 मान लिया जाए कि विपक्ष को हर बात जानने का हक है लेकिन राष्ट्र की विश्वसनीयता और अस्मिता को धता बताने का हक उसे किसने दिया. क्या विपक्ष इसलिए होता है कि वह दुश्मन देश के हित चिंतन में अपनी उर्जा खपाए, क्या विपक्ष का यह दायित्व नहीं है कि देश और देश की सेना ने दुश्मन देश के विरुद्ध जो कदम उठाए हैं उनका समर्थन करे. लेकिन विपक्ष देश की अस्मिता और गौरव को पलीता लगाने और अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए प्रपंच रच कर देश की अवाम की नजरों में स्वयं गिरने का काम कर रहा है.
 एयर स्ट्राइक के बाद जब देश की जनता से सेना और सरकार को इस कदम का समर्थन और प्रशंसा मिलने लगी तो विपक्ष की सांसें फूलने लगी. उसे लगने लगा कि लोकसभा चुनावों के पहले उपजे इस राष्ट्रवाद का सीधा सीधा लाभ चुनावों में मोदी को मिलने से नहीं रोका जा सकता. ऑल पार्टी मीटिंग के बाद जैसा लग रहा था कि समूचा विपक्ष पाकिस्तान के विरुद्ध सरकार के साथ खड़ा है, एयर स्ट्राइक के एक सप्ताह बाद ही यह भ्रम टूट गया. कभी भाजपा के सिपहसालार रहे अब कांग्रेस में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू एयर स्ट्राइक पर भारतीय सेना के पराक्रम पर यह कहकर सवाल उठाते हैं कि सेना ने बालाकोट में आतंकवादियों को नहीं पेड़ों को नष्ट किया. और यह भी कि आतंकवाद का कोई देश नहीं होता, तो दुख होता है. ऐसी हिमाकत करने वालों को क्या कहा जाए. वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने आश्चर्यजनक टिप्पणी की जिसमें उन्होंने पुलवामा हमले को ‘एक दुर्घटना’ निरूपित कर दिया.  कपिल सिब्बल, चिदम्बरम, मनीष तिवारी, मायावती, ममता, फारुक, उमर और महबूबा मुफ्ती जैसे कई नेताओं ने सबूत मांगे जिसका पाकिस्तान ने पुलवामा को अपने पक्ष में करने का भरपूर प्रयत्न किया. पाकिस्तानी चेनलों पर इन नेताओं के बयान फोटो सहित प्रसारित किए जा रहे हैं.
     भारत को छोड़कर विश्व का ऐसा कोई राष्ट्र नहीं जहां सरकार का विपक्ष स्वयं के देश का  मजाक उड़ाने में सक्रिय हो लेकिन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विपक्ष के विरोध करने के अधिकार के नाम पर हास्यास्पद जग हंसाई की जा रही है. इसमें कोई शक नहीं कि सत्तारूढ़ दल भी एयर स्ट्राइक की कार्यवाही का लोकसभा चुनावों में लाभ उठाना चाह रहा है  किंतु यह भी उतना ही सच है कि यह स्थितियां पुलवामा हमले के  कारण पैदा हुईं. यदि यह हमला इस समय नहीं होता तो इसका कोई इंपैक्ट लोकसभा चुनाव पर नहीं होता. आज मोदी की लोकप्रियता की स्थिति को देखकर समूचा विपक्ष और पाकिस्तान पुलवामा हमले की टाइमिंग पर मन ही मन दुखी हो रहे होंगे. यह पीड़ा भी विपक्ष द्वारा छुपाए नहीं छुप रही. यही कारण है कि कांग्रेस के बड़े नेता बी के हरिप्रसाद ने तो पुलवामा हमले को मोदी और इमरान की मैच फिक्सिंग निरूपित कर दिया. ऐसी सोच और मानसिकता से कोई भी सहमत नहीं हो सकता. जिस देश पर इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ हो जिसमें तेंतालीस जवानों  की शहादत हुई हो उसे  देश के मोदी विरोधी नेता मोदी की दुश्मन देश के प्रधानमंत्री इमरान से मैच फिक्सिंग निरूपित करें, दुर्भाग्यपूर्ण ही कहां जाएगा. सबसे बड़ा दुखद पहलू देश का यही है कि हमारे यहां दल हित  चिंतन देशहित चिंतन से बड़ा हो गया है. कोई भी यह समझने को तैयार नहीं कि राष्ट्र और राष्ट्रहित से बड़ी ना तो कोई विचारधारा होती है और ना कोई दल.
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शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

  एक मजबूत प्रधानमंत्री और हताश विपक्ष


                एक मजबूत प्रधानमंत्री और हताश विपक्ष
                        डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
     पुलवामा हमले के बाद देश में चारों तरफ जहां एक ओर प्रधानमंत्री मोदी से पाकिस्तान से बदला लेने की अपेक्षाएं बढ़ गई है वहीँ देश का विपक्ष निराश और हताश नजर आ रहा है. कहने को ऑल पार्टी मीटिंग के बाद ऐसा लगा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ देश के सभी राजनीतिक दल एक मत से सरकार के साथ हैं किंतु जैसे जैसे समय गुजरा वैसे वैसे सबके चेहरे उजागर होने लगे. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस हो या देश के अति सीमित क्षेत्र में अपनी पहचान समेटे हुए कम्युनिस्ट हों या समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाजवादी पार्टी हो या महबूबा हों या उमर अब्दुल्ला या एक वाक्य में कहें तो सभी मोदी विरोधी धीरे धीरे सरकार द्वारा लिए जा रहे निर्णयों की आलोचना करने लगे हैं. कारण साफ है कि लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और पुलवामा हमले के बाद सरकार के पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ कठोर प्रहार से देश में मोदी के ऊंचे होते हुए ग्राफ से विरोधी दल सकते में हैं. यही कारण है कि सभी विरोधी अगर- मगर, किंतु- परंतु के साथ अपने विचार व्यक्त करते हुए दिखाई दे रहे हैं. ये सब भारत के स्टैंड के विरुद्ध परोक्ष रूप से पाकिस्तान का बचाव करते नजर आ रहे हैं. इस क्रम में वह पाकिस्तान को कम और मोदी को ज्यादा कोस रहे हैं.
मोदी के कठोर रुख और निर्णयों से  पाकिस्तान अपनी आजादी के बाद पहली बार इतने दबाव में है कि वह सिवाय बचाव करने के कुछ नहीं कर पा रहा है. बात बात पर परमाणु हमले की धमकी देने वाला पाकिस्तान आज बातचीत की गुहार लगा रहा है. इमरान खान की बॉडी लैंग्वेज बताती है कि पाकिस्तान भारत के कठोर रुख से डरा हुआ है. पाकिस्तान के विरुद्ध उठाए गए कदमों ने उसे बुरी तरह झकझोर कर  रख दिया है. पुलवामा हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान को दिए गए मोस्ट फेवर्ड नेशन के दर्जे को वापस लेने के निर्णय ने मोदी के रुख को स्पष्ट कर दिया कि भारत पाकिस्तानी प्रायोजित आतंकवाद को नहीं सहेगा. यही नहीं इस दर्जे को वापस लेने के साथ ही भारत ने कस्टम ड्यूटी भी दो सौ पर्सेंट तक बढ़ा दी. पाकिस्तान की इकोनामी की कमर तोड़ने के लिए ऐसे निर्णय की पाकिस्तान ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. यही नहीं सरकार ने जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान परस्त दोगले 18 अलगाववादियों और 155 नेताओं की सुरक्षा कवच और बड़ी संख्या में उन्हें उपलब्ध वाहनों को हटाकर भी यह संदेश देने में सफलता पाई कि जो भी पाकिस्तान का समर्थन करेगा उसे सरकार स्वीकार नहीं करेगी. यहां लोग पूछते हैं की धारा 370 और 35कब हटेगी तो यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मोदी एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति हैं और अगर उन्हें मौका मिला और जब परिस्थितियों का साथ और राज्यसभा में पूर्व पूर्ण बहुमत मिला तो वह दिन दूर नहीं जब कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा और 370 और 35ए भी हट ही जाएगी. यही नहीं सरकार ने एक बड़ा निर्णय कर पाकिस्तान को घुटनों पर लाने में सफलता पाई है. मोदी सरकार ने घोषणा कर दी है कि इंडस वाटर ट्रीटी के आधार पर पाकिस्तान को मिल रहे अतिरिक्त पानी को भी रोका जाएगा. इसके तहत भारत के हिस्से का पानी अब पाकिस्तान को नहीं दिया जाएगा. अभी सतलुज, व्यास और रावी नदियों का पानी पाकिस्तान को मिलता रहा है. सरकार ने निर्णय किया है कि अब वह अपने हिस्से का अतिरिक्त पानी इन नदियों पर बांध बनाकर पंजाब, जम्मू कश्मीर और हरियाणा को उपलब्ध कराएगी. इस हेतु पाक जाने वाले पानी को रोकने के लिए डैम बनाने का काम जारी है.          स्वाभाविक है कि पाकिस्तान पानी की समस्या से जूझेगा. पानी रोकने का यह निर्णय एक ऐसा निर्णय है कि पाकिस्तान खून के आंसू रोएगा. तब उसे समझ आएगा कि जनता की जरूरत पूरी करें या पाकिस्तान की आई एस आई और सेना की मंशा पूरी करें.  
    सच्चाई तो यह है कि ऐसे कठोर निर्णयों की पाकिस्तान तो क्या मोदी विरोधियों ने भी उम्मीद नहीं की थी. यही कारण है कि देश का विपक्ष भी सकते में आ गया है. यही नहीं लोकसभा चुनावों के मद्देनजर मोदी को बढ़त मिलती देखकर देश का विपक्ष अब अपने पाकिस्तान के प्रति नरम रुख पर वापस फोकस करने लगा है नहीं तो कोई कारण नहीं था कि कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पुलवामा हमले पर सियासत करते. ऑल पार्टी मीटिंग के बाद आतंकवाद के खिलाफ सरकार के साथ खड़े होने की बात करने वाली कांग्रेस 7 दिन बाद ही मोदी को निशाने पर ले बैठी. उसने इस बात की परवाह नहीं की कि जो वह कह रही है उसका प्रभाव आज की स्थिति में जनता पर नकारात्मक ही होगा. छिछले आरोपों से कभी भी बड़े उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता और आतंकवाद को ढाल बनाकर तो कतई ही नहीं. यह कांग्रेस को सोचना होगा. यह जानते हुए भी की पुलवामा हमले में जैश के आतंकी थे और यह भी कि जैश -ए -मोहम्मद ने इसकी जिम्मेदारी ली थी, कांग्रेस ने इन आतंकियों को स्थानीय आतंकी निरूपित किया जो किसी भी व्यक्ति के गले नहीं उतर सकता. जब सारी दुनिया पुलवामा के हमले में भारत के साथ खड़ी है तब कांग्रेस का मोदी विरोध उसके दल हित  चिंतन पर प्रश्न खड़े करता है. अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी के, हमले के दिन पूर्व निर्धारित  कार्यक्रमों पर छिछली टिप्पणी कर उन्होंने देश पर हुए गंभीर आतंकी हमले के मुद्दे को हास्यास्पद बना दिया. जो कांग्रेस जैसी सबसे पुरानी पार्टी से अपेक्षा नहीं की जा सकती. उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी ने शहादत का अपमान किया जबकि वे भूल गए कि राहुल गांधी को एयरपोर्ट पर शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि के दौरान मोबाइल ऑपरेट करते हुए पूरी दुनिया ने देखा. उनके नेता सुशील शिंदे कहते हैं ‘सर्जिकल स्ट्राइक के कारण हमला’ हुआ तो कपिल  सिब्बल कहते हैं ‘यह हमला हाइपर नेशनलिज्म का दुष्परिणाम है’ तो वहीं नवजोत सिंह सिद्धू के मत में यह हमला ‘पाकिस्तान ने नहीं किया, आतंक का कोई देश नहीं होता’. कांग्रेस की यह कैसी राजनीती है. सुरजेवाला यह कहते हुए मोदी को कोसते हैं कि ‘सीआरपीएफ पर हमला मोदी की नाकामी है’. ऐसे ही देश के सारे विपक्षी दल मोदी विरोध में राजनीतिक रोटियां सेंकते नजर आए. विपक्ष को आलोचना करने का अधिकार है इसमें कोई दो राय नहीं किंतु आलोचना का स्तर क्या हो, क्या उसे इस पर विचार नहीं करना चाहिए. क्या ऐसा कर विपक्ष पाकिस्तान और उसके द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का समर्थन नहीं कर रहां. देश की एकता- अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को इस तरह विवादित बनाना किसी भी दल को अभीष्ट की प्राप्ति नहीं करा सकता. पुलवामा हमले के बाद आतंकवाद के इस मुद्दे पर पाकिस्तान के विरुद्ध आज जब विश्व के अनेक देश जिनमें रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, न्यूजीलैंड, इजरायल, सऊदी अरब और ईरान जैसे कई देश भारत के साथ खड़े हैं तब विपक्ष मोदी का विरोध करे, यह ना केवल निंदनीय है बल्कि अक्षम्य है. आज की स्थिति में मोदी आतंकवाद से लड़ाई में विश्व में एक अहम और अग्रणी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं. यह मोदी ही हैं जिनके नेतृत्व के कारण ही आज पाकिस्तान दुनिया भर में अलग-थलग पड़ गया है. वास्तव में मोदी आज एक मजबूत प्रधानमंत्री बनकर उभरे हैं लेकिन देश का विपक्ष अपनी हताशा से नहीं उबर पा रहा.




बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

बदला नहीं तो मोदी भी नहीं

                                   बदला नहीं तो मोदी भी नहीं
                   डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
      पुलवामा हमला मोदी के शासनकाल का भीषण और कभी ना भुलाया जाने वाला पाक प्रायोजित आतंकवाद का निकृष्टतम उदाहरण है जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवानों के प्राणों की आहुति हुई. यह ऐसा हमला है जिस पर न केवल देश का एक एक नागरिक उद्वेलित हुआ बल्कि आक्रोश से भरा हुआ है. देश के चारो छोरों से बदला लेने की आवाजें सुनाई दे रही हैं. हमले पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया कि “पुलवामा हमले के दोषियों को ना केवल बख्शा नहीं जाएगा बल्कि इसका बदला लिया जाएगा, कब और कैसे यह सेना तय करेगी” ने भारतीय जनमानस में अतिरिक्त जोश भर दिया है. भारतीय जनमानस की आवाजें चीख चीख कर बदले की गुहार कर रही हैं. उसका धैर्य यदि कुछ बड़ी कार्यवाही नहीं होती तो टूटना तय है. यह सही है कि हमले के 100 घंटे के भीतर ही पुलवामा हमले के आतंकी जैश कमांडर गाजी और उसके दो साथियों को मौत के घाट उतार दिया गया लेकिन यह कार्रवाई ऑपरेशन ऑल आउट के क्रम में ही देखी जा रही है. भारत की जनता इससे कुछ अलग और कुछ बड़ा चाहती चाहती है जो यह साबित कर सके कि लिया गया बदला ना केवल विलक्षण था बल्कि उसने दुश्मनों की मंशाओं पर कुठाराघात करने का काम किया और यह भी कि यह ऐसा बदला हो जिसका कोई उदाहरण ना रहा हो और आगे दुश्मन देश पाकिस्तान ऐसी जुर्रत नहीं कर सके.
 पुलवामा हमले के बाद सेना के 5 जवान और शहीद हुए जिसका असर देश की जनता पर गंभीर रूप में देखा जा रहा है. साफ है कि हमलों का सिलसिला किसी भी हमले के बाद थमता नहीं. क्या कोई ऐसा बदला नहीं लिया जा सकता कि पुलवामा का हमला आखरी साबित हो. जनता पूछ रही है और कब तक हम अपने सैनिकों की जानें गवांते रहेंगे. जनता परिणाम चाहती है आश्वासन नहीं. भारत की जनता पाकिस्तान को रोते हुए देखना चाहती है यह कब होगा हरएक के मस्तिष्क में अनुत्तरित प्रश्न है. मोदी के बदला ऐलान ने पाकिस्तान को इतना डरा दिया कि उसकी घिग्घी बंध गई है. 4 दिनों तक पाकिस्तान का कोई बयान नहीं आया और जब इमरान का बयान आया तो उससे लगा कि पाकिस्तान को पुलवामा हमले का कोई अफसोस नहीं है. इमरान ने उसकी भर्त्सना भी नहीं की. बल्कि इमरान ने कहा बिना किसी सबूत के पुलवामा हमले के लिए पाकिस्तान को क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. इस मासूमियत पर ठहाका लगाने का मन करता है. यह जानते हुए कि हमले के दिन ही जैश-ए-मोहम्मद ने इसकी जिम्मेदारी ली थी तब यह कहना कि सबूत नहीं है बेवकूफी भरा बयान है और यह भी कि जब 26/11 हुआ या भारत के उरी में 19 जवानों की शहीदी हुई या पठानकोट हमला हुआ तब भारत ने हर एक हमले के ठोस सबूत दिए तब पाकिस्तान ने क्या किया. अब हालात बदल चुके हैं हमला पाकिस्तानी आतंकियों ने किए हैं यह भारत दृढ़ता से कह रहा है. भारत सबूत नहीं देगा क्योंकि हमलावर पाकिस्तान में हैं और यह भी कि अगर पाक को अपना बचाव करना है तो वह सबूत दे कि हमला उसके आतंकी संगठन जैश नहीं किया.
हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को पालने पोषने वाले पाकिस्तान को अब सबूत नहीं ताबूत दिए जाएं. इमरान को होश में आ जाना चाहिए, उन्हें अपने देश की जनता के बारे में सोचना चाहिए ना कि भारत और कश्मीर के बारे में. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा उसे इमरान की सात पुश्तें भी आ जाएं तो जुदा नहीं कर सकती. वस्तुतः पाकिस्तान कश्मीर समस्या के नाम पर ही देश में आतंक फैलाता है और इसमें उसका साथ कश्मीर के दोगले और गद्दार नेता, अलगाववादी, बुद्धिजीवी, पत्रकार और भारत के ख़िलाफ़ बरगलाए गए युवा देते हैं. यहां यह जरूर कहना पड़ेगा कि देश को जितना नुकसान पाकिस्तान से हो रहा है उससे कहीं अधिक इन कश्मीरी पाक परस्तों से हो रहा है. चाहे फारूक अब्दुल्लाह हो या उमर अब्दुल्ला या महबूबा हो या सैफुद्दीन सोज हो या सारे के सारे अलगाववादी हों, ये  पाक परस्त लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए ना केवल पाकिस्तान का गुणगान करते हैं बल्कि पाक  आतंकियों के लिए भारत में हमला करने के लिए सहायता करते हैं. पाकिस्तान से अरबों की सहायता पाकर ये ही भारतीय सेना पर 500 -500 रु. की दिहाड़ी पर सेना पर पत्थर फिकवाते हैं. इन्हें वंदे मातरम, भारत माता के नाम से चिढ़ है. इन्हें भारत के संविधान से चिढ़ है. इन्हें मोदी से चिढ़ है, क्योंकि मोदी तुष्टीकरण की राजनीति नहीं करते. तो सबसे पहली प्राथमिकता सरकार की यह होनी चाहिए कि इन देशद्रोहियों को कैसे कमजोर किया जाए. जब तक घाटी में यह फलते फूलते रहेंगे तब तक कश्मीर की समस्या बनी रहेगी. वहीँ कश्मीर को समस्या बनाए रखने में धारा 370 और 35 A बहुत बड़ी सहयोगी हैं. जरूरत इस बात की है कि हर हाल में इनको हटा दिया जाए. जिस दिन कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा, 370 और 35A से हटा ली गई उसी दिन तथाकथित कश्मीर समस्या अपने आप सुलझ जाएगी. पाक प्रधानमंत्री इमरान ने यह भी कहा कि वह बदले की कार्यवाही का मुंहतोड़ जवाब देंगे. तो देश की जनता चाहती है कि बदला लिया जाए जिससे देखा जा सके कि पाकिस्तान कैसा जवाब देता है. इमरान नवाज शरीफ की तरह ही सेना के एक पपेट प्रधानमंत्री हैं जो सेना अध्यक्ष जनरल बाजवा और आई एस आई की जुबान बोलते हैं. वह क्या जवाब देंगे पूरी दुनिया जानना चाहती है. बस जरूरत इस बात की है कि भारत गर्म लोहे पर चोट करे, जितनी देर होगी लोहा ठंडा हो चुकेगा और फिर कुछ नहीं होगा. अगर कुछ होगा तो वह यह कि लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी अपने 2004 के परिणामों को दौरा नहीं सकेंगे. और यह भी कि बड़ा बदला भी तब ही माना जाएगा जब 40 के बदले पाकिस्तान के 400 हलाक़ हों.

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

मध्य प्रदेश : कांग्रेस जीती किंतु भाजपा भी हारी नहीं


         मध्य प्रदेश : कांग्रेस जीती किंतु भाजपा भी हारी नहीं

                      डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया  
       28 नवंबर को रात 1:30 बजे जब मतदान दलों की सामग्री जमा हो रही थी मेरे एक मित्र ने पूछा कि मतदान तो बंपर हुआ है, क्या लगता है- सरकार किसकी बनेगी. एक साधारण समझ से मैंने कहा कि कुछ भी हो 116 सीटों के साथ भाजपा सरकार बना सकती है. उन्होंने कहा कारण- तब मेरा जवाब था कि टक्कर कांटे की नजर आ रही है किंतु भाजपा ने जनकल्याण के इतने कार्य किए हैं कि कुछ भी हो वह सरकार बना लेगी. बात आई गई हो गई.
   11 दिसंबर की सुबह से ही जब मतगणना शुरू हुई लगने लगा कि मतगणना के अंतिम चक्र तक कौन सरकार बनाएगा की स्थिति स्पष्ट होना मुश्किल है. मतगणना में क्रिकेट के 20- 20 मैच की तरह उतार-चढ़ाव आते गए. कभी भाजपा आगे होती तो कभी कांग्रेस आगे हो जाती. ऐसा रोमांच मध्य प्रदेश के चुनावों में आज तक के इतिहास में कभी नहीं रहा. सामान्यता मतगणना के सभी चक्र अधिकतम 2:00 बजे दोपहर तक पूरे होकर स्थिति स्पष्ट हो जाती रही किंतु इस बार के चुनाव में मतगणना अर्धरात्रि के बाद तक चलती रही. और पूरी तस्वीर दूसरे दिन ही स्पष्ट हो सकी कि कांग्रेस ने 114 सीटें और भाजपा ने 109 सीटें जीती. कुल मिलाकर एक हैंग एसेम्बली की स्थिति बनी. दोनों ही बड़े दलों को बहुमत नहीं मिला. लेकिन संख्या बल के आधार पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने और बसपा और सपा के समर्थन से सरकार बनाने की स्थिति में आ गई.
    बात अगर मध्य प्रदेश में मतदान व्यवहार की करें तो इस बार के चुनाव अप्रत्याशित रूप से रोमांचक रहे. मतदान के दिन से मतगणना के अंतिम परिणाम आने तक राजनीतिक पंडित भी यह कहने की स्थिति में नहीं रहे कि किसकी सरकार बनेगी. एग्जिट पोल के नतीजों ने जो रुझान बताया वह भी इतनी स्पष्टता नहीं बता सके. हां यह अनुमान जरूर सही निकला कि भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है. कितनी विचित्र बात है कि 2013 में भाजपा को 38% वोट मिले थे लेकिन उसकी सीटों की संख्या 166 थी वहीं इस चुनाव में उसे 41 % वोट मिलने के बाद भी सीटों की संख्या मात्र 109 रही. वहीं कांग्रेस को भी 40.9% वोट मिले किंतु इसकी सीटें 114 हो गइं. वस्तुतः मध्य प्रदेश में दोनों ही दलों को लगभग बराबर बराबर वोट मिले किंतु कांग्रेस को 0.1% कम वोट मिलने के बाद भी उसकी 5 सीटें अधिक रहीं. अगर हम दोनों पार्टियों में वोटों के अंतर की बात करें तो कांग्रेस को भाजपा से 45,827 वोट कब मिले किंतु उसकी सीटों की संख्या में वृद्धि रही.
 भाजपा की स्थिति ऐसी क्यों हुई अगर हम विश्लेषण करें तो पाते हैं कि निश्चित तौर पर ऐसा कोई कारण नहीं था कि सामान्य से सामान्य स्थिति में भी भाजपा सरकार न बना पाती. भाजपा के 15 वर्षों के और शिवराज के 13 वर्षों के कार्यकाल में मध्यप्रदेश में जितने विकास कार्य हुए इतने मध्य प्रदेश के गठन के बाद कभी नहीं हुए. सड़क, पानी और बिजली जैसी अहम सुविधाओं में अकल्पनीय वृद्धि हुई. शिक्षा स्वास्थ्य की स्थिति इन 15 वर्षों में सुधरी. शिवराज खुद एक किसान होने के कारण उन्होंने किसानों की तकलीफों को कम करने में कोई कमी नहीं रखी. गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह कराए, पढ़ने वाली लड़कियों को साइकिल मुहैया कराई, वृद्धावस्था पेंशन और तीर्थ दर्शन की सुविधाएं उपलब्ध कराई. कर्मचारियों को केंद्र के बराबर समय-समय पर महंगाई भत्ता स्वीकृत किया. कर्मचारियों को कुछ अपवादों को छोड़कर छठवां और सातवां वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किया. विगत 5 साल में प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों के खोलने का काम किया. सिंचाई की सुविधाओं में वृद्धि की. आवास विहीन परिवारों को केंद्र की योजना के अनुसार आवासों के निर्माण कराए. प्रदेश में उज्जवला योजना के अंतर्गत परिवारों को गैस कनेक्शन दिए, और बहुत सी ऐसी योजनाएं शुरू कीं जो जन कल्याण के लिए आवश्यक थीं. तब ऐसी स्थिति के बावजूद आखिर क्यों जनता ने उन्हें चौथी बार सरकार बनाने से रोक दिया. यह सवाल हर एक के मन में कौंध रहा है.
    अगर हम गंभीरता से विचार करें तो लगता है कि सबसे बड़ा कारण एंटी इनकंबेंसी रही. किसी पार्टी की सरकार जब अपने तीन कार्यकाल पूरे कर लेती है तो जनता के मन में बदलाव की एक हूक उठती है कि अब कुछ नया होना चाहिए. इस तरह के बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण राजस्थान है जहां पिछले दो दशक से हर 5 साल में जनता सरकार बदल देती है. मध्यप्रदेश में यही कारण रहा कि भाजपा चौथी बार सरकार बनाने में असफल रही.
    दूसरा बड़ा कारण एट्रोसिटी एक्ट पर केंद्र सरकार की एससी- एसटी वर्ग की तुष्टीकरण के कारण हिंदी बेल्ट के प्रदेशों में अगड़ी और पिछड़ी जातियों में असंतोष ने भी सरकार बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. सवर्ण जाति के मतदाताओं ने भाजपा को वोट नहीं दिया बल्कि उन्होंने कांग्रेस को वोट दिया या नोटा में दिया. जिसके परिणाम स्वरूप भाजपा सत्ता से बाहर हो गई. मध्यप्रदेश में नोटा के मतों की संख्या 5,42,295 रही जो निश्चित रूप से भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाता थे. भाजपा को यद्धपि कांग्रेस से ज्यादा मत मिले और यदि नोटा में गए मत उसे मिल जाते तो कोई कारण नहीं था की वह चौथी बार सरकार नहीं बनाती. निश्चित रूप से एट्रोसिटी एक्ट में केंद्र सरकार द्वारा ऑर्डिनेंस लाना भाजपा को तीनों राज्यों राजस्थान छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भारी पड़ गया. एट्रोसिटी एक्ट पर ऑर्डिनेंस का कारण मूलतः यही रहा कि भाजपा नेतृत्व अनुसूचित जाति और जनजाति को नाराज नहीं करना चाहती थी. उसका मानना रहा होगा की अगड़ी जाति उनकी मजबूरी समझेगी लेकिन उसके इस कदम ने अगड़ी जातियों में असंतोष पैदा कर दिया. जिसका परिणाम नोटा के रूप में भुगतना पड़ा. तो दूसरी ओर जिस अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को साधने का प्रयत्न किया गया उसने भी साथ नहीं दिया क्योंकि आजादी के बाद से आज तक उसका सॉफ्ट कॉर्नर हमेशा कांग्रेस की तरफ रहा है. वहीँ सारी सुविधाएं देने के बाद भी प्रदेश का सबसे बड़ा किसान वर्ग भी नीमच गोली कांड के बाद भाजपा से नाराज था. विचित्र बात यह है कि जहां गोली चली वहां नीमच और मंदसौर की सभी सीटें भाजपा ने जीतीं. किंतु वहां के आंदोलन ने प्रदेश के दूसरे हिस्सों के किसानों को प्रभावित किया जहां भाजपा को उनकी नाराजगी झेलना पड़ी. दूसरी तरफ केंद्र सरकार के जीएसटी के कारण छोटे व्यापारियों की नाराजी भी भाजपा की हार का कारण बनी. एक वाक्य में कहा जाए तो सवर्णों, छोटे व्यापारियों और किसानों की नाराजगी ने भाजपा को सत्ता से दूर करने में बड़ी भूमिका निभाई. तो दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने प्रचार मे  ऐसी लुभावनी घोषणाएं कीं कि उससे प्रदेश का बड़ा वर्ग किसान और बेरोजगार ज्यादा प्रभावित हुआ. कांग्रेस ने वादा किया कि वह 10 दिन में सरकार बनते ही किसानों का कर्ज माफ कर देगी. किसानों के बिजली बिल आधे कर देगी, पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती करेगी. बेरोजगारों को प्रतिमाह दस हजार रु. देने की भी उसने घोषणा की. कुल मिलाकर इन चुनावों ने कांग्रेस को  संजीवनी दी जिससे उसकी राजनीतिक छबि में उछाल आ गया. कांग्रेस मध्यप्रदेश में जीत जरूर गई लेकिन 15 साल की एंटी इनकंबेंसी के बाद भी भाजपा के मतों में वृद्धि और 109 सीटों का मिलना यह प्रकट करता है कि भाजपा भी हारी नहीं है, वह सत्ता से प्रथक जरूर हो गई है.
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